सेवक संजयनाथ तांत्रिक काली मन्दिर रक्सौल में सामूहिक रूप से ६०१ कलश की स्थापना संपन्न हुई। जो की एक विश्व रिकॉर्ड है। एक ही प्रान्गंड में ६०१ भक्तो के ओरसे दसहरा की पूजा में दस महाविद्या देवियों की आराधना हेतु ६०१ कलश दिनांक १८ सितम्बर २००९ को स्थापित हुए। इस प्रकार मन्दिर ने स्वयं अपने ही ५५१ कलश स्थापना के पुराने रिकॉर्ड को इस बार तोड़ दिया। विश्व में यह पहला ऐसा मन्दिर है जहा एकसाथ इतने कलशो की स्थापना होती है और भक्तजन एक साथ माँ काली की दसहरा में आराधना करते हैं।
चाइना, जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड, श्रीलंका, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, मौरिसिअस जैसे देशों से भी श्रधालुओं ने कलश स्थापना करवाए। ओर भारत देश के भी सभी कोनो से भक्तो ने कलश स्थापना करवाया। बिहार, बंगाल, महारास्त्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब , तमिल नाडू, कर्नाटक आदि राज्यों से भक्तो ने दस महाविद्या साधना करने के लिए कलश स्थापित करवाए।
इन सभी ६०१ भक्तो के लिए मन्दिर और ट्रस्ट के कार्यकर्ताओं ने मात्र २०१ रुपए में दसहरा के दसो दिनों की पूजा की पूरी व्यवस्था की है।
Saturday, 19 September 2009
दसहरा के अवसर पर दस महाविद्या की देवियों की तांत्रिक आराधना कैसे करें?
दसहरा के नवरात्र पूजा भारत में एक बहुत ही प्रमुख पर्व है। इसे काली पूजा, दुर्गा पूजा इत्यादी नामो से जाना जाता है। इन दस दिन में दस महाविद्या की दसो देवियों की दसो दिशाओं में पूजा की जाती है।
ऐसा करने से दस महाविद्या की दसो देवियाँ प्रसन्न होती हैं तथा भक्तो और साधको को सभी कष्टों से उबारती हैं।
अपने पूर्व लेखों में मैंने दस महाविद्या की दसों देवियों की नवरात्र में प्रतेक दिन कैसे आराधना करनी है उसका वर्णन किया था। मैं एक बार फ़िर दस महा विद्या पूजा का महात्म आप सभी को बताना चाहता हूँ।
माँ काली दसो दिशाओं में दस महा विद्या के रूप में वास करती है। इसी लिए दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में माँ काली के दस मुख, दस हाथो और दस पैरों का वर्णन है। दस महा विद्या की दस देवियाँ मनुष्य की सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति करती हैं।
माँ काली काल को हरती हैं
माँ तारा पापों से मनुष्यों को तारती हैं।
माँ भुवनेश्वरी हमें भुवन के सभी सुख प्राप्त करने का आर्शीवाद देती हैं।
माँ षोडशी हमारे यौवन को सदा बना रखती हैं।
माँ छिन्मस्तिका मनुष्य के मस्तिक्ष की चिंताओं को हरती है तथा मति प्रदान करती हैं।
माँ भैरवी सभी प्रकार के भ्रम दूर करती है तथा शक्ति प्रदान करती हैं।
माँ धूमावती हमारे जीवन की धुंध को दूर करती हैं
माँ बगलामुखी सभी दुश्मनों का मर्दन करती हैं।
माँ मातंगी मातृत्व का सुख प्रदान करती हैं।
माँ कमला सभी प्रकार के सुख समृधि प्रदान करती हैं।
दस महा विद्या की देवियों की इन दस दिनों में किस प्रकार साधना करनी है उसके लिए निम्न लेखो को पढे.
१ प्रथम दिन - माँ काली http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_27.html
२ दूसरा दिन - माँ तारा http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_3376.html
३ तीसरा दिन - माँ भुवनेश्वरी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_8850.html
४ चौथा दिन - माँ षोडशी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_28.html
५ पांचवा दिन - माँ छिन्मस्तिका http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_29.html
६ छठा दिन - माँ भैरवी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_30.html
७ सातवाँ दिन - माँ धूमावती http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_7290.html
८ आठवा दिन - माँ बगलामुखी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_5568.html
९ नौवा दिन - माँ मातंगी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_6393.html
१० दसवां दिन - माँ कमला http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_7899.html
ऐसा करने से दस महाविद्या की दसो देवियाँ प्रसन्न होती हैं तथा भक्तो और साधको को सभी कष्टों से उबारती हैं।
अपने पूर्व लेखों में मैंने दस महाविद्या की दसों देवियों की नवरात्र में प्रतेक दिन कैसे आराधना करनी है उसका वर्णन किया था। मैं एक बार फ़िर दस महा विद्या पूजा का महात्म आप सभी को बताना चाहता हूँ।
माँ काली दसो दिशाओं में दस महा विद्या के रूप में वास करती है। इसी लिए दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में माँ काली के दस मुख, दस हाथो और दस पैरों का वर्णन है। दस महा विद्या की दस देवियाँ मनुष्य की सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति करती हैं।
माँ काली काल को हरती हैं
माँ तारा पापों से मनुष्यों को तारती हैं।
माँ भुवनेश्वरी हमें भुवन के सभी सुख प्राप्त करने का आर्शीवाद देती हैं।
माँ षोडशी हमारे यौवन को सदा बना रखती हैं।
माँ छिन्मस्तिका मनुष्य के मस्तिक्ष की चिंताओं को हरती है तथा मति प्रदान करती हैं।
माँ भैरवी सभी प्रकार के भ्रम दूर करती है तथा शक्ति प्रदान करती हैं।
माँ धूमावती हमारे जीवन की धुंध को दूर करती हैं
माँ बगलामुखी सभी दुश्मनों का मर्दन करती हैं।
माँ मातंगी मातृत्व का सुख प्रदान करती हैं।
माँ कमला सभी प्रकार के सुख समृधि प्रदान करती हैं।
दस महा विद्या की देवियों की इन दस दिनों में किस प्रकार साधना करनी है उसके लिए निम्न लेखो को पढे.
१ प्रथम दिन - माँ काली http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_27.html
२ दूसरा दिन - माँ तारा http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_3376.html
३ तीसरा दिन - माँ भुवनेश्वरी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_8850.html
४ चौथा दिन - माँ षोडशी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_28.html
५ पांचवा दिन - माँ छिन्मस्तिका http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_29.html
६ छठा दिन - माँ भैरवी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_30.html
७ सातवाँ दिन - माँ धूमावती http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_7290.html
८ आठवा दिन - माँ बगलामुखी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_5568.html
९ नौवा दिन - माँ मातंगी http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_6393.html
१० दसवां दिन - माँ कमला http://merivaanimerajeevan.blogspot.com/2009/03/blog-post_7899.html
Thursday, 28 May 2009
वामा खेपा की लीला...
काली पूजा की रात में वामा का अभिषेक कैलाशपति बाबा द्वारा हुआ। सिद्ध मंत्र पा कर वामा खेपा बिल्कुल उलट पलट हो गए। वह हमेशा शीमल वृक्ष के नीचे बैठ कर जाप किया करते,परन्तु हमेशा अजीब अजीब आवाजें बिन बादल गर्जन होना, मरे बच्चो की कूदफांद, कान के पास गरम साँस का महसूस होना जैसी घटनाये वामा को और चंचल कर देती थी। शिव चतुर्दशी के दिन गुरुदेव का आदेश पा कर वामा फ़िर अपने आसन पर बैठे और सिद्ध बीज मंत्र का जाप शुरू किया। सुबह से शाम हो गई पर वामा तब भी तन्मय हो कर देवी माँ तारा के ध्यान में लगे रहे। रात बढ़ने लगी और घोर अन्धकार हो गया, वातावरण पूरा शांत था। रात में २ बजे के बाद वामा का शरीर कापने लगा और पूरा शमशान फूलो की महक से सुगन्धित हो उठा। अचानक आकाश से नीले प्रकाश की ज्योति फुट पड़ी। चारो तरफ़ प्रकाश ही प्रकाश हो गया और प्रकाश के बीचों बीच तारा माँ ने वामा खेपा को दर्शन दिए।
उस भव्य और सुंदर देवी को देख कर आनंद में वामा सबकुछ भूल गए। इतनी कम उम्र में वामा को माँ का दर्शन होना सिर्फ़ भक्ति और विश्वास के कारण था। सबने शमशान में प्रकाश देखा पर माँ के दर्शन तो सिर्फ़ वामा खेपा को ही हुए, तब से वाम देव जगत में पूज्य हो गए। तारापीठ के महंत मोक्षानंद पहले से ही वामा की महानता को जानते और इसलिए ही उन्होंने वामा को अपना शिष्य बनाया था। मोक्षानंद के मरने के बाद १८ वर्ष की उम्र में ही वामा चरण को तारापीठ का पीठाधीश बना दिया गया।
एक बार द्वारका नदी में स्नान करते समय उन्हे द्वारका नदी के उस पार राम नाम की ध्वनि सुनाई दी। कुछ देर बाद उन्होंने देखा की कुछ लोग घाट के उस पार एक शव ले कर आए हैं। वामा ने उत्सुकता वश वह शव देखा तो पता चला की वह उनकी माँ का ही शव था। माँ का शव देखते ही वह माँ माँ कह कर चिल्लाने लगे। कुछ भक्तो ने वामा चरण को सान्तवना दिया। वामा की इक्षा थी की उनकी माँ का शव माँ तारा के शमशान में ही जलाया जाए।
परन्तु बरसात के दिन थे और शव को नदी के दुसरे पार तारा शमशान तक ले जाना नामुमकिन था। सभी लोगों ने बामा खेपा को समझाया औरघाट के इस पार ही क्रिया कर्म करने की सलाह दी। परन्तु वामा खेपा माँ तारा का नाम लेते हुए अपनी माँ का शव अपने पीठ पर ले कर नदी को पैदल ही पार कर गए। और अंत में उन्होंने अपनी माँ का अन्तिम संस्कार माँ तारा के शमशान में पूरा किया।
उनके माँ के श्राद्ध का दिन नज़दीक आने लगा था। वह अपने गाव आतला गए। श्राद्ध से तीन दिन पहले वह पहुँच कर उन्होंने अपने छोटे भाई राम चरण से कहा की माँ के श्राद्ध के लिए घर के सामने वाली जमीन को साफ़ सुथरा कर दो, तथा आस पास के गाव के लोगों को निमंत्रण दे आओ। राम चरण ने अपने पागल भाई की बात पर ध्यान नही दिया और उनसे कहा की अभी तो हम स्वयं कष्ट में हैं। ऐसी हालत में हम लोगों को कहा से खिलाएंगे?
राम चरण के मना करने के बाद वामा खेपा ने स्वयं जमीन अपने हाथों से साफ़ की और वापस शमशान चले गए।
श्राद्ध वाले दिन अपने आप बडे बडे राजा महाराजों ने वामा के घर अपने आप अन्न और भोजन का सामन भेजनाशुरू कर दिया। यह देख कर राम चरण दंग रह गए और उन्हे तब अपने भाई की शक्ति का एहसास हुआ।
शाम को ब्रह्मण भोज के समय अचानक से मुसलाधार वर्षा होने लगी। राम चरण यह देख कर रोने लगे और इश्वर को याद करने लगे। तब तक वामा खेपा वह पहुंचे। उन्हे देखते ही राम चरण अपने भाई के चरण पकड़ कर रोने लगे। उन्होंने कहा की इतनी तेज़ बारिश में ब्रह्मण कैसे भोजन कर पाएंगे? तब वामा खेपा ने अपने शमशान का डंडा आकाश की तरफ़ कर दिया। और मुसलाधार बारिश होने के बाद भी ब्रह्मण भोज की जगह एक बूँद पानी नही गिरा। और उनकी माँ का श्राद्ध बिना किसी रूकावट के संपन्न हुआ। यह देख कर सभी चकित रह गए और वामा खेपा की शक्ति को प्रणाम करने लगे। अब ब्राह्मणों को अपने घर भी वापस जाना था, परन्तु बारिश काफी तेज़ पड़ रही थी। तब वामा खेप ने आकाश में चिल्लाते हुए माँ तारा से कहा की हे माँ क्या तू भी बाप के सामान कठोर हो गई है!! उनके इतना कहते ही ब्राह्मणों के घर जाने के मार्गो पर बारिश पड़ना बंद हो गया।
वामा खेपा शमशान में माँ तारा की पूजा अर्चना करते थे।वह रोज माँ को भोग लगते थे और माँ स्वयं आकर उनका भोग ग्रहण करती थी। एक दिन उन्होंने माँ को भोग लगाया परन्तु माँ नही आई। क्रोधित हो कर वामा ने माँ की मूर्ती पर मूत्र कर दिया। ऐसा करते देख मन्दिर के बाकि लोगों ने देख लिया। उन लोगों को बहुत बुरा लगा और उन्होंने रानी से वामा के इस घटना की शिकायत कर दी। रानी ने क्रोधित हो कर अपने दरबानों को आदेश दिया और वामा को पीट कर मन्दिर से बहार निकल फेंका। वामा को शमशान में फेंक दिया। फ़िर रानी ने दुसरे पंडित को माँ का भोग लगाने का कार्य दे दिया। चार दिन तक वामा खेपा शमशान में बिना कुछ खाए पिए पड़े रहे।
तब चार दिन के उपरांत माँ तारा ने रानी को अर्ध चैतन्य अवस्था में दर्शन दिए और कहा की रानी मैंने चार दिनों से भोग ग्रहण नही किया है। तब रानी ने चकित होकर माँ से कहा की हे माँ आपको तो रोज़ भोग लगता है। माँ तारा ने कहा की मेरा एक पागल बेटा है जिसे तुम्हारे दरबानों ने
पीट कर बहार फेंक दिया। उसने भी चार दिनों से कुछ नही खाया है। अतः मैंने भी चार दिन से उपवास किया है। इसपर रानी बोली। " माँ उस व्यक्ति ने आप की मूर्ति पर मूत्र कर दिया था इसलिए मैंने उसे दंड दिया"। इस पर माँ तारा बोली यदि बालक अपनी माँ पर मूत्र कर दे तो क्या माँ उसे दंड देती है? वह मेरा बेटा है। वह मुझपर मूत्र करे या फ़िर मुझे मारे तुम्हे दंड देना का अधिकार नही है।यदि अपने राज्य का भला चाहती हो तो सम्मानपूर्वक मेरे बेटे को वापस लाओ। और आजके बाद वामा को पहले भोग लगेगा तब ही मैं भोग ग्रहण करुँगी। ऐसा कह कर माँ अंतर्ध्यान हो गई।तब रानी ने वामा खेपा को आदरसहित मन्दिर में बुलाया। तब से हमेशा वामा खेपा को भोग लगने लगा और तब ही माँ तारा भोग ग्रहण करती थी।
इस प्रकार वामा खेप के जीवन में अनेको चमत्कार होते रहे। वामा खेपा के पहले वाम मार्ग एकदम विलुप्त हो रहा था। परन्तु उनकी भक्ति और चमत्कारों की वजह से वाम मार्ग को प्रसिद्धि मिली।
उस भव्य और सुंदर देवी को देख कर आनंद में वामा सबकुछ भूल गए। इतनी कम उम्र में वामा को माँ का दर्शन होना सिर्फ़ भक्ति और विश्वास के कारण था। सबने शमशान में प्रकाश देखा पर माँ के दर्शन तो सिर्फ़ वामा खेपा को ही हुए, तब से वाम देव जगत में पूज्य हो गए। तारापीठ के महंत मोक्षानंद पहले से ही वामा की महानता को जानते और इसलिए ही उन्होंने वामा को अपना शिष्य बनाया था। मोक्षानंद के मरने के बाद १८ वर्ष की उम्र में ही वामा चरण को तारापीठ का पीठाधीश बना दिया गया।
एक बार द्वारका नदी में स्नान करते समय उन्हे द्वारका नदी के उस पार राम नाम की ध्वनि सुनाई दी। कुछ देर बाद उन्होंने देखा की कुछ लोग घाट के उस पार एक शव ले कर आए हैं। वामा ने उत्सुकता वश वह शव देखा तो पता चला की वह उनकी माँ का ही शव था। माँ का शव देखते ही वह माँ माँ कह कर चिल्लाने लगे। कुछ भक्तो ने वामा चरण को सान्तवना दिया। वामा की इक्षा थी की उनकी माँ का शव माँ तारा के शमशान में ही जलाया जाए।
परन्तु बरसात के दिन थे और शव को नदी के दुसरे पार तारा शमशान तक ले जाना नामुमकिन था। सभी लोगों ने बामा खेपा को समझाया औरघाट के इस पार ही क्रिया कर्म करने की सलाह दी। परन्तु वामा खेपा माँ तारा का नाम लेते हुए अपनी माँ का शव अपने पीठ पर ले कर नदी को पैदल ही पार कर गए। और अंत में उन्होंने अपनी माँ का अन्तिम संस्कार माँ तारा के शमशान में पूरा किया।
उनके माँ के श्राद्ध का दिन नज़दीक आने लगा था। वह अपने गाव आतला गए। श्राद्ध से तीन दिन पहले वह पहुँच कर उन्होंने अपने छोटे भाई राम चरण से कहा की माँ के श्राद्ध के लिए घर के सामने वाली जमीन को साफ़ सुथरा कर दो, तथा आस पास के गाव के लोगों को निमंत्रण दे आओ। राम चरण ने अपने पागल भाई की बात पर ध्यान नही दिया और उनसे कहा की अभी तो हम स्वयं कष्ट में हैं। ऐसी हालत में हम लोगों को कहा से खिलाएंगे?
राम चरण के मना करने के बाद वामा खेपा ने स्वयं जमीन अपने हाथों से साफ़ की और वापस शमशान चले गए।
श्राद्ध वाले दिन अपने आप बडे बडे राजा महाराजों ने वामा के घर अपने आप अन्न और भोजन का सामन भेजनाशुरू कर दिया। यह देख कर राम चरण दंग रह गए और उन्हे तब अपने भाई की शक्ति का एहसास हुआ।
शाम को ब्रह्मण भोज के समय अचानक से मुसलाधार वर्षा होने लगी। राम चरण यह देख कर रोने लगे और इश्वर को याद करने लगे। तब तक वामा खेपा वह पहुंचे। उन्हे देखते ही राम चरण अपने भाई के चरण पकड़ कर रोने लगे। उन्होंने कहा की इतनी तेज़ बारिश में ब्रह्मण कैसे भोजन कर पाएंगे? तब वामा खेपा ने अपने शमशान का डंडा आकाश की तरफ़ कर दिया। और मुसलाधार बारिश होने के बाद भी ब्रह्मण भोज की जगह एक बूँद पानी नही गिरा। और उनकी माँ का श्राद्ध बिना किसी रूकावट के संपन्न हुआ। यह देख कर सभी चकित रह गए और वामा खेपा की शक्ति को प्रणाम करने लगे। अब ब्राह्मणों को अपने घर भी वापस जाना था, परन्तु बारिश काफी तेज़ पड़ रही थी। तब वामा खेप ने आकाश में चिल्लाते हुए माँ तारा से कहा की हे माँ क्या तू भी बाप के सामान कठोर हो गई है!! उनके इतना कहते ही ब्राह्मणों के घर जाने के मार्गो पर बारिश पड़ना बंद हो गया।
वामा खेपा शमशान में माँ तारा की पूजा अर्चना करते थे।वह रोज माँ को भोग लगते थे और माँ स्वयं आकर उनका भोग ग्रहण करती थी। एक दिन उन्होंने माँ को भोग लगाया परन्तु माँ नही आई। क्रोधित हो कर वामा ने माँ की मूर्ती पर मूत्र कर दिया। ऐसा करते देख मन्दिर के बाकि लोगों ने देख लिया। उन लोगों को बहुत बुरा लगा और उन्होंने रानी से वामा के इस घटना की शिकायत कर दी। रानी ने क्रोधित हो कर अपने दरबानों को आदेश दिया और वामा को पीट कर मन्दिर से बहार निकल फेंका। वामा को शमशान में फेंक दिया। फ़िर रानी ने दुसरे पंडित को माँ का भोग लगाने का कार्य दे दिया। चार दिन तक वामा खेपा शमशान में बिना कुछ खाए पिए पड़े रहे।
तब चार दिन के उपरांत माँ तारा ने रानी को अर्ध चैतन्य अवस्था में दर्शन दिए और कहा की रानी मैंने चार दिनों से भोग ग्रहण नही किया है। तब रानी ने चकित होकर माँ से कहा की हे माँ आपको तो रोज़ भोग लगता है। माँ तारा ने कहा की मेरा एक पागल बेटा है जिसे तुम्हारे दरबानों ने
पीट कर बहार फेंक दिया। उसने भी चार दिनों से कुछ नही खाया है। अतः मैंने भी चार दिन से उपवास किया है। इसपर रानी बोली। " माँ उस व्यक्ति ने आप की मूर्ति पर मूत्र कर दिया था इसलिए मैंने उसे दंड दिया"। इस पर माँ तारा बोली यदि बालक अपनी माँ पर मूत्र कर दे तो क्या माँ उसे दंड देती है? वह मेरा बेटा है। वह मुझपर मूत्र करे या फ़िर मुझे मारे तुम्हे दंड देना का अधिकार नही है।यदि अपने राज्य का भला चाहती हो तो सम्मानपूर्वक मेरे बेटे को वापस लाओ। और आजके बाद वामा को पहले भोग लगेगा तब ही मैं भोग ग्रहण करुँगी। ऐसा कह कर माँ अंतर्ध्यान हो गई।तब रानी ने वामा खेपा को आदरसहित मन्दिर में बुलाया। तब से हमेशा वामा खेपा को भोग लगने लगा और तब ही माँ तारा भोग ग्रहण करती थी। इस प्रकार वामा खेप के जीवन में अनेको चमत्कार होते रहे। वामा खेपा के पहले वाम मार्ग एकदम विलुप्त हो रहा था। परन्तु उनकी भक्ति और चमत्कारों की वजह से वाम मार्ग को प्रसिद्धि मिली।
Wednesday, 13 May 2009
वामा खेपा की तारापीठ की कहानी...
बंगाल के इतिहास में वीरभूमि जिला एक विख्यात जिला है। हिन्दुओं के ५१ शक्तिपीठों में से पाँच शक्ति पीठ वीरभूमि में ही हैं। इसी कड़ी में उनीस्वी शताब्दी में वीरभूमिकी पवित्रता साधक वामा खेपा ने एक बार फ़िर बढाई।
राजा दशरथ के कुल पुरोहित वशिष्ठ मुनि ने भी वीरभूमि से जुड़ कर इतिहास में इस भूमि की शान बढाई। इसलिए वीरभूमि जिला हिंदू वाम मर्गियों का महा तीर्थ बना। यहाँ पर स्थापित वशिष्ठ मुनि के सिंघासन पर अनेको साधको ने अपनी सिद्धिया प्राप्त की। जिनमें से प्रमुख महाराज राजा राम कृष्ण परमहंस, आनंदनाथ, मोक्ष्दानंद , वामा खेपा के नाम आते है। इसी भूमि पर स्वयं मैंने भी अपनी सिद्धि, शव साधना द्वारा प्राप्त की।
यह वही जगह है जहा पर सुदर्शन चक्र ने माँ सती के नेत्र को काट कर गिराया था। इसी लिए इसका नाम तारापुर पड़ा। और आगे चल कर इस भूमि का नाम तारापीठ से प्रसिद्ध हुआ।
वाम मार्ग के प्रमुख्य साधक वामा खेपा महाराज की व्याख्या किए बिना वाम मार्ग का वर्णन अधुरा है। उत्सुक वाम भक्तो की जानकारी हेतु मैं यहाँ संचिप्त में वामा खेपा महाराज की जीवनी की व्याख्या कर रहा हूँ।
शास्त्र में कहा गया है समाज में जब भी जातिवाद की प्रथा बढ़ी है तो उसके उद्धार के लिए माँ ने अपने किसी न किसी दूत को जरुर भेजा है। इसी कड़ी में धरती पर वाम अवतार के रूप में वामा खेपा को माँ ने भेजा। यह ऐसे साधक हुए जो ब्रह्मण कुल में जनम लेने के बाद भी किसी प्रकार के छूतछात में विश्वास नही रखते थे। तारापीठ से तीन मील की दुरी पर स्थित आतला ग्राम में १२४४ साल के फागुन महीने में शिव चतुर्दशी के दिन उनका जनम हुआ। उनके पिता का नाम सर्वानन्द चटोपाध्याय था एवं वह एक धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी माता का नाम श्रीमती राजकुमारी था तथा वह एक धर्मपरायण साध्वी स्त्री थीं। वामा खेपा की ४ बहने थी तथा वह दो भाई थे। वामा खेपा का नाम था वामा चरण एवं उनके छोटे भाई का नाम राम चरण था। ब्रह्मण परिवार होते हुए भी यह परिवार आर्थिक दृष्टि से कमजोर था। जिस कारण हमेशा घर में आभाव रहता था। कभी घर में चावल नही होता, तो कभी दाल नही तथा कभी सब्जी नही होती थी। तब भी वामा खेपा जी के पिता आनंदमय रहते थे तथा आँखों में आंसू लिए हुए सदा माँ का भजन करते रहते थे। गावं के लोग उनको सर्वा खेपा के नाम से चिढाते थे ( खेपा का अर्थ बंगाली में पगला होता है ) परन्तु वह हमेशा मस्त रहते थे। अपने पिता के संस्कार को देखते हुए बाल अवस्था में ही वामा चरण पाँच वर्ष की अल्प आयु में अपने हाथों से मिटटी की बहुत सुंदर माँ तारा की प्रतिमा बना लेते थे। एवं वह ऐसे भक्त थे की जब उन्हे माँ के बाल कैसे बनाएं समझ नही आया तो उन्होंने स्वयं अपने सारे बाल नोच कर माँ तारा की मूर्ति के सर पर लगा दिया था।
अपने तन मन की लगन से बनाई हुई यह मूर्ति एकदम सजीव लगती थी। पास में ही एक जावाफूल का पेड़ था। उसमें से फूल ले कर बालक वामा चरण एकाग्र होकर माँ तारा की पूजा करते रहते थे। घर में ही एक जामुन का भी वृक्ष था, उसी जामुन के फल से वह माँ तारा का भोग लगाते थे। तथा माँ से कहते थे की माँ तू पहले जामुन खा तभी मैं खाऊँगा। पर मूर्ति तो न कुछ बोलती थी और ना ही हिलती थी। इसपर बालक वामा चरण रोने लगते थे।
और जामुन वैसे ही मूर्ति के सामने रखे रहते थे। एक दिन उनके पिता ने यह देखा। तो उनकी आँखों में भी बाल भक्ति का यह अविस्मरनीय दृश देख कर आंसू आ गए। वामा चरण पिता जी को देखते ही उनसे पूछने लगे की माँ तारा कौन सा फल खाती हैं ? आप तो कितने फल ले कर पूजा करते हैं और कहते हैं की माँ मन ही मन फल खा लेती है और फ़िर हम प्रसाद ग्रहण करते हैं। तो फिर मेरे फल क्यों नही खाती? तब सर्वानन्द जी ने वामा चरण को समझाया की तुम्हारी माँ तुम्हे खिलाये बिना क्या कभी खाती है या सोती है? माँ पहले अपने बालक को खिला कर ही स्वयम कुछ खाती है। उसी प्रकार यह जगत की माता सारे संसार के बच्चो को खिलाये बिना नही खाती। तब वामा चरण ने फ़िर पुछा की माँ तारा बोलती क्यों नही है? तब उनके पिता ने कहा की माँ से बात करने के लिए तपस्या करनी पड़ती है।
यह बात सुन कर बालक वामा चरण अपनी जन्मदात्री माँ के पास पहुंचे और उनसे जा कर पुछा की माँ क्या तुम तारा माँ के साथ मेरी बात करा सकती हो ? ऐसा सुन कर वामा चरण की माँ उन्हे ले कर चुपचाप पूजा ग्रह में माँ तारा के सामने बैठ गयीं। इसी तरह नित्य माँ तारा की आराधना करते करते वामा चरण की उम्र ग्यारह वर्ष तथा उनके भाई की उम्र पाँच वर्ष की हो गई। इसी बीच उनके पिता की सेहत ख़राब हो गई और मृत्यु शैया पर माँ तारा का नाम जपते हुए उनके प्राण निकल गए। उसी वक्त जब माँ तारापीठ के शमशान में वामा चरण ने अपने पिता का अन्तिम शंस्कार किया तब उन्हे माँ तारा के प्रथम बार शमशान में दर्शन हुए। विधवा माँ ने किसी तरह भीख मांग कर अपने पति के श्राद्ध का काम पूरा किया। मृत्यु की ख़बर पा कर वामा चरण के मामा नौ ग्राम से आ कर दोनों भाइयों को अपने घर ले गए। वामा चरण गाय चराने ले जाते थे तथा उनके छोटे भाई गायों के लिए घास कटते थे। इसके एवज में उन्हे आधा पेट झूठा भात खाने को दिया जाता था।
एक बार वामा चरण को एक बड़ी से टोकरी ले कर गोबर उठाने और राम चरण को घास काटने के लिए उनके मामा ने कहा। राम चरण की असावधानी के कारन वामा चरण की ऊँगली कट गई। तब राम चरण भाई भाई कह कर रोने लगे। तब तक इनकी गाय ने बगल के खेत में खड़ी फसल को नष्ट कर दिया। उस खेत के मालिक ने मामा से शिकायत कर दी। मामा ने छड़ी लेकर वामा चरण को खूब मारा। उसी के बाद वामा भाग कर अपनी माँ के पास आतला ग्राम वापस लौट आए। और राम चरण को एक साधू अपने साथ गाना सिखाने ले गए। तभी से वामा ने शमशान में रहना निश्चित किया।
उस दिन पूरनमासी थी, और शमशान में कई लोग बैठे थे। उनके पैर दबाते दबाते वामा सो गए।उसी बीच शमशान में बैरागी साधक गांजा पी कर उसके आग को एक जगह फेक दिया। हवा के झोंके से वह आग एक झोपडी में लग गई और देखते देखते सारे गाँव को झुलस दिया। गाँव वालों ने समझा की यह वामा चरण की गलती है। गाँव वाले उन्हें खोजने लगे। उनके डर से वामा चरण भक्त प्रहलाद की कहानी याद करते हुए आग में ख़ुद ही कूद गए। वह चिल्लाते रहे की मैंने आग नही लगायी है। धीरे धीरे पूरा गाँव आग में झुलस गया परन्तु वामा चरण कुंदन के समान आग से सकुशल निकल आए। और दौड़ते हुए अपनी माँ के पास अपने गाँव भाग गए।
आर्थिक स्तिथि ख़राब होने के कारन एक दिन उनकी माँ ने उन्हे बहुत भला बुरा कहा, उसी समय वामा घर से जो निकले तो फ़िर कभी अपने घर वापस नही आए। यहाँ से ही वामा चरण की साधना प्रारम्भ हुई। उसी समय तारापीठ के महा शमशान में शिमल वृक्ष के नीचे सिद्ध महापुरुष कैलाशपति बाबा आनेवाले थे। मोक्षानंद बाबा, गोसाईं बाबा आदि सभी ने वामा को वहा आश्रय दिया। प्रति दिन वामा जीवन कुंडा में स्नान करते और गांजा चुगते थे। कैलाशपति बाबा उनको बहुत मानते थे। कैलाशपति बाबा ने वामा को अपने शमशान में रहने का स्थान दिया। उनका खद्दोऊ पहन कर द्वारका नदी के ऊपर चलना और मुरझाये हुए तुलसी वृक्ष को हरा भरा कर देना जैसे आलौकिक कार्यों को देख कर वामा चकित रह गए। एक बार रात में कैस्लाश्पति बाबा ने वामा को गांजा तैयार करने के लिए बुलाया। उस दिन वामा को बहुत डर लगा। असंख्य दैत्याकार आकृतियाँ उनके चारो तरफ़ घेर कर खड़ी थी। यह देख कर वामा बेहोश हो गए। बाद में जय गुरु जय तारा कहते हुए वह सब आकृतियाँ विलीन हो गयीं। तब वामा ने साहस करके कैलाशपति बाबा को गांजा दिया।
शेष कहानी के लिए इंतज़ार करे...
राजा दशरथ के कुल पुरोहित वशिष्ठ मुनि ने भी वीरभूमि से जुड़ कर इतिहास में इस भूमि की शान बढाई। इसलिए वीरभूमि जिला हिंदू वाम मर्गियों का महा तीर्थ बना। यहाँ पर स्थापित वशिष्ठ मुनि के सिंघासन पर अनेको साधको ने अपनी सिद्धिया प्राप्त की। जिनमें से प्रमुख महाराज राजा राम कृष्ण परमहंस, आनंदनाथ, मोक्ष्दानंद , वामा खेपा के नाम आते है। इसी भूमि पर स्वयं मैंने भी अपनी सिद्धि, शव साधना द्वारा प्राप्त की।
यह वही जगह है जहा पर सुदर्शन चक्र ने माँ सती के नेत्र को काट कर गिराया था। इसी लिए इसका नाम तारापुर पड़ा। और आगे चल कर इस भूमि का नाम तारापीठ से प्रसिद्ध हुआ।
वाम मार्ग के प्रमुख्य साधक वामा खेपा महाराज की व्याख्या किए बिना वाम मार्ग का वर्णन अधुरा है। उत्सुक वाम भक्तो की जानकारी हेतु मैं यहाँ संचिप्त में वामा खेपा महाराज की जीवनी की व्याख्या कर रहा हूँ।
शास्त्र में कहा गया है समाज में जब भी जातिवाद की प्रथा बढ़ी है तो उसके उद्धार के लिए माँ ने अपने किसी न किसी दूत को जरुर भेजा है। इसी कड़ी में धरती पर वाम अवतार के रूप में वामा खेपा को माँ ने भेजा। यह ऐसे साधक हुए जो ब्रह्मण कुल में जनम लेने के बाद भी किसी प्रकार के छूतछात में विश्वास नही रखते थे। तारापीठ से तीन मील की दुरी पर स्थित आतला ग्राम में १२४४ साल के फागुन महीने में शिव चतुर्दशी के दिन उनका जनम हुआ। उनके पिता का नाम सर्वानन्द चटोपाध्याय था एवं वह एक धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी माता का नाम श्रीमती राजकुमारी था तथा वह एक धर्मपरायण साध्वी स्त्री थीं। वामा खेपा की ४ बहने थी तथा वह दो भाई थे। वामा खेपा का नाम था वामा चरण एवं उनके छोटे भाई का नाम राम चरण था। ब्रह्मण परिवार होते हुए भी यह परिवार आर्थिक दृष्टि से कमजोर था। जिस कारण हमेशा घर में आभाव रहता था। कभी घर में चावल नही होता, तो कभी दाल नही तथा कभी सब्जी नही होती थी। तब भी वामा खेपा जी के पिता आनंदमय रहते थे तथा आँखों में आंसू लिए हुए सदा माँ का भजन करते रहते थे। गावं के लोग उनको सर्वा खेपा के नाम से चिढाते थे ( खेपा का अर्थ बंगाली में पगला होता है ) परन्तु वह हमेशा मस्त रहते थे। अपने पिता के संस्कार को देखते हुए बाल अवस्था में ही वामा चरण पाँच वर्ष की अल्प आयु में अपने हाथों से मिटटी की बहुत सुंदर माँ तारा की प्रतिमा बना लेते थे। एवं वह ऐसे भक्त थे की जब उन्हे माँ के बाल कैसे बनाएं समझ नही आया तो उन्होंने स्वयं अपने सारे बाल नोच कर माँ तारा की मूर्ति के सर पर लगा दिया था।
अपने तन मन की लगन से बनाई हुई यह मूर्ति एकदम सजीव लगती थी। पास में ही एक जावाफूल का पेड़ था। उसमें से फूल ले कर बालक वामा चरण एकाग्र होकर माँ तारा की पूजा करते रहते थे। घर में ही एक जामुन का भी वृक्ष था, उसी जामुन के फल से वह माँ तारा का भोग लगाते थे। तथा माँ से कहते थे की माँ तू पहले जामुन खा तभी मैं खाऊँगा। पर मूर्ति तो न कुछ बोलती थी और ना ही हिलती थी। इसपर बालक वामा चरण रोने लगते थे।
और जामुन वैसे ही मूर्ति के सामने रखे रहते थे। एक दिन उनके पिता ने यह देखा। तो उनकी आँखों में भी बाल भक्ति का यह अविस्मरनीय दृश देख कर आंसू आ गए। वामा चरण पिता जी को देखते ही उनसे पूछने लगे की माँ तारा कौन सा फल खाती हैं ? आप तो कितने फल ले कर पूजा करते हैं और कहते हैं की माँ मन ही मन फल खा लेती है और फ़िर हम प्रसाद ग्रहण करते हैं। तो फिर मेरे फल क्यों नही खाती? तब सर्वानन्द जी ने वामा चरण को समझाया की तुम्हारी माँ तुम्हे खिलाये बिना क्या कभी खाती है या सोती है? माँ पहले अपने बालक को खिला कर ही स्वयम कुछ खाती है। उसी प्रकार यह जगत की माता सारे संसार के बच्चो को खिलाये बिना नही खाती। तब वामा चरण ने फ़िर पुछा की माँ तारा बोलती क्यों नही है? तब उनके पिता ने कहा की माँ से बात करने के लिए तपस्या करनी पड़ती है।
यह बात सुन कर बालक वामा चरण अपनी जन्मदात्री माँ के पास पहुंचे और उनसे जा कर पुछा की माँ क्या तुम तारा माँ के साथ मेरी बात करा सकती हो ? ऐसा सुन कर वामा चरण की माँ उन्हे ले कर चुपचाप पूजा ग्रह में माँ तारा के सामने बैठ गयीं। इसी तरह नित्य माँ तारा की आराधना करते करते वामा चरण की उम्र ग्यारह वर्ष तथा उनके भाई की उम्र पाँच वर्ष की हो गई। इसी बीच उनके पिता की सेहत ख़राब हो गई और मृत्यु शैया पर माँ तारा का नाम जपते हुए उनके प्राण निकल गए। उसी वक्त जब माँ तारापीठ के शमशान में वामा चरण ने अपने पिता का अन्तिम शंस्कार किया तब उन्हे माँ तारा के प्रथम बार शमशान में दर्शन हुए। विधवा माँ ने किसी तरह भीख मांग कर अपने पति के श्राद्ध का काम पूरा किया। मृत्यु की ख़बर पा कर वामा चरण के मामा नौ ग्राम से आ कर दोनों भाइयों को अपने घर ले गए। वामा चरण गाय चराने ले जाते थे तथा उनके छोटे भाई गायों के लिए घास कटते थे। इसके एवज में उन्हे आधा पेट झूठा भात खाने को दिया जाता था।
एक बार वामा चरण को एक बड़ी से टोकरी ले कर गोबर उठाने और राम चरण को घास काटने के लिए उनके मामा ने कहा। राम चरण की असावधानी के कारन वामा चरण की ऊँगली कट गई। तब राम चरण भाई भाई कह कर रोने लगे। तब तक इनकी गाय ने बगल के खेत में खड़ी फसल को नष्ट कर दिया। उस खेत के मालिक ने मामा से शिकायत कर दी। मामा ने छड़ी लेकर वामा चरण को खूब मारा। उसी के बाद वामा भाग कर अपनी माँ के पास आतला ग्राम वापस लौट आए। और राम चरण को एक साधू अपने साथ गाना सिखाने ले गए। तभी से वामा ने शमशान में रहना निश्चित किया।
उस दिन पूरनमासी थी, और शमशान में कई लोग बैठे थे। उनके पैर दबाते दबाते वामा सो गए।उसी बीच शमशान में बैरागी साधक गांजा पी कर उसके आग को एक जगह फेक दिया। हवा के झोंके से वह आग एक झोपडी में लग गई और देखते देखते सारे गाँव को झुलस दिया। गाँव वालों ने समझा की यह वामा चरण की गलती है। गाँव वाले उन्हें खोजने लगे। उनके डर से वामा चरण भक्त प्रहलाद की कहानी याद करते हुए आग में ख़ुद ही कूद गए। वह चिल्लाते रहे की मैंने आग नही लगायी है। धीरे धीरे पूरा गाँव आग में झुलस गया परन्तु वामा चरण कुंदन के समान आग से सकुशल निकल आए। और दौड़ते हुए अपनी माँ के पास अपने गाँव भाग गए।
आर्थिक स्तिथि ख़राब होने के कारन एक दिन उनकी माँ ने उन्हे बहुत भला बुरा कहा, उसी समय वामा घर से जो निकले तो फ़िर कभी अपने घर वापस नही आए। यहाँ से ही वामा चरण की साधना प्रारम्भ हुई। उसी समय तारापीठ के महा शमशान में शिमल वृक्ष के नीचे सिद्ध महापुरुष कैलाशपति बाबा आनेवाले थे। मोक्षानंद बाबा, गोसाईं बाबा आदि सभी ने वामा को वहा आश्रय दिया। प्रति दिन वामा जीवन कुंडा में स्नान करते और गांजा चुगते थे। कैलाशपति बाबा उनको बहुत मानते थे। कैलाशपति बाबा ने वामा को अपने शमशान में रहने का स्थान दिया। उनका खद्दोऊ पहन कर द्वारका नदी के ऊपर चलना और मुरझाये हुए तुलसी वृक्ष को हरा भरा कर देना जैसे आलौकिक कार्यों को देख कर वामा चकित रह गए। एक बार रात में कैस्लाश्पति बाबा ने वामा को गांजा तैयार करने के लिए बुलाया। उस दिन वामा को बहुत डर लगा। असंख्य दैत्याकार आकृतियाँ उनके चारो तरफ़ घेर कर खड़ी थी। यह देख कर वामा बेहोश हो गए। बाद में जय गुरु जय तारा कहते हुए वह सब आकृतियाँ विलीन हो गयीं। तब वामा ने साहस करके कैलाशपति बाबा को गांजा दिया।
शेष कहानी के लिए इंतज़ार करे...
Friday, 8 May 2009
पञ्च मकार और तांत्रिक साधना का हमारे जीवन में महत्त्व....
युगों युगों से तंत्र साधना मानवता के उद्धार और कष्टों को दूर करने के लिए प्रकृति में उपलब्ध गुणों को खोज कर निकल लायी है। जैसा की हम सभी जानते हैं की इस श्रृष्टि में प्रकृति ने सभी प्रकार के कष्टों का निवारंड पहले से ही दे रखा है। प्राचीन काल में सन्यासी, ऋषि, मुनि और तांत्रिक इन्हे खोज निकालते थे। आधुनिक युग के वैज्ञानिको को ही पूर्व में तांत्रिक और ऋषि कहा गया था।
हमारे हिंदू धर्म में सभी चीजों की खोज बहुत पहले ही हो चुकी है। परन्तु जब आज वोही पुरानी चीजे आधुनिक वैज्ञानिक फ़िर से दुनिया को बता रहे हैं तो हमें आश्चर्य होता है। मैं यहाँ कुछ उदहारण देता हूँ।
आधुनिक युग का रेडियो जिसे हम कुछ वर्षो से जानते हैं , हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्राचीन काल से साधना और ध्यानमग्न मात्र होने से ही दूर बैठे मनुष्य से वार्तालाप हो जाता था। तांत्रिक साधना में एक तांत्रिक रेडियो के सामान ही सही समय पर सही किरणों के प्रभाव से दूर दूर बैठे लोगों के साथ जुड़ सकता है। इस प्रकार वह प्राणियों के कष्ट को दूर करता है। तंत्र साधन की वजह से तांत्रिक इन किरणों से ध्यान मग्न हो कर अपनी आन्तरिक शक्ति भी बढ़ता है।
तंत्र क्रिया सदेव ही प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलती है। यह पूरा संसार ही एक तांत्रिक क्रिया है। तांत्रिक क्रिया पञ्च मकार से मिल कर ही पूरी होती है। पञ्च मकार यानि तंत्र क्रिया के पाँच स्तम्भ।
मॉस, मतस्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन तांत्रिक क्रिया के पञ्च मकार हैं। तथा बिना इन पञ्च मकार के सम्मिलन से श्रृष्टि में जीवन का सञ्चालन असंभव है।
मॉस: इस श्रृष्टि में प्राणी का जनम ही मॉस के लोथडे के रूप में हुआ है। ऐसा कोई भी प्राणी नही है जो पञ्च मकर के प्रथम " म" मॉस से वंचित रह कर जीवन यापन कर सके। मॉस के रूप में ही मनुष्य एवं जीवों की अपने माँ के गर्भ से उत्पत्ति हुई है। हर प्राणी किसी न किसी प्रकार मॉस का उपयोग अपने दैनिक क्रिया में करता है। चाहे वह भोजन में मॉस का लेना हो या फ़िर किसी को छूना, देखना या महसूस करना सभी में मॉस की प्राथमिकता है।
जब माँ के गर्भ में जीवन का विकास होता है तब उसका सबसे पहला वजूद मॉस के रूप में ही होता है। इस से सिद्ध होता है की जीवन की शुरुवात ही पञ्च मकार के प्रथम " म " से होती है।
मतस्य: मतस्य का शाब्दिक अर्थ मछली से होता है। परन्तु तंत्र क्रिया में अथवा पञ्च मकार में मतस्य का मतलब चंचलता या गति से होता है। जिस प्रकार मछली अपने जीवनपर्यंत गतिमान रहती है और पानी के विपरीत दिशा में तैरते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार तंत्र साधना के अनुसार बिना गति के कोई भी जीव इस संसार में रह नही सकता। पञ्च मकार के मॉस गुण के प्राणी में आने के बाद मतस्य गुण का होना एक मॉस को गति प्रदान करता है। पञ्च मकार के दुसरे मकार " मतस्य" से ही संसार में जीवो को हमेशा आगे बढ़ने की इक्षा मिलती हैं । मतस्य गुण ही व्यक्ति को नए कार्यो के प्रति प्रगतिशील बनता है।
मुद्रा: तंत्र में मुद्रा के दो रूप हैं।
१> मुद्रा यानी किसी प्रकार की क्रिया जो व्यक्त की जा सके। जैसे योनी मुद्रा, लिंग मुद्रा, ज्ञान मुद्रा।
२> मुद्रा का मतलब खाद्य पदार्थ से भी है। जैसे चावल के पिण्ड
पञ्च मकार के मॉस, मतस्य गुण धारण करने के बाद जीव में सही मुद्रा (क्रिया) के ज्ञान का होना अति आवश्यक है। और सही क्रिया को करने के लिए सही मुद्रा ( खाद्द्य पदार्थ ) की भी आवश्यकता है।
जब गर्भ में जीव गति प्राप्त कर लेता है तब वह अपने हाथ और पैर को अपने गर्दन के चारो और बाँध कर एक मुद्रा धारण करता है। जैसे ही वह अपनी माता द्वारा ग्रहण किया गया भोजन को अपना आहार बनाता है, उसके हाथ पैर में गति आ जाती है। यह पञ्च मकार के तीसरे " म " का श्रेष्ठ उदहारण है।
मदिरा : तंत्र में मदिरा का अर्थ "नशा" है। आम मनुष्य मदिरा पीने वाले नशे को ही तंत्र से जोड़ते हैं। परन्तु सही मायने में पञ्च मकार में मदिरा रुपी नशे को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होने वाली लगन को कहते हैं। इश्वर की भक्ति को प्राप्त करने का नशा ही तांत्रिक को कठिन से कठिन साधना पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीव को आगे बढ़ने के लिए स्वयं में मदिरा गुण को लाना अति आवश्यक है।
पञ्च मकार के यह चारों गुन जब साथ मिलते हैं तो वह जीव मॉस (शरीर ), मतस्य (गति),मुद्रा (क्रिया,आहार )और मदिरा (नशा) के आने के बाद अपने जीवन में कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
जब बालक अपने माँ के गर्भ में बड़ा हो रहा होता है तो वह समय उसके लिए बहुत कष्टकारी होता है। माँ के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन उसकी कोमल त्वचा को चोट पहुचाता है। गति आने के बाद और माँ से आहार मिलने के बाद वह जीव स्वयं को इस कष्ट से निकलने के लिए इश्वर से प्राथना करता है। उसके अन्दर मदिरा गुण का प्रवेश होते ही वह अपने कष्ट को दूर करने के लिए इश्वर की प्रार्थना में ली
मैथुन:मैथुन का अर्थ है "मथना " तंत्र में मैथुन का बहुत महत्त्व है। परन्तु इसे किस प्रकार अपने जीवन में अपनाना है वह जानना बहुत जरुरी है। अधिकतर लोगों को तंत्र के बारे में यह भ्रान्ति है की यहाँ तांत्रिक को मैथुन करने की छुट है। मैं यहाँ पञ्च मकार के इस पांचवे और बहुत ही महत्व्य्पूर्ण " म " के बारे में बताना चाहता हूँ।
तंत्र में यह कहा गया है की इस संसार में पाई जाने वाली हर वस्तु को यदि सही प्रकार से मथा जाए तो एक नई वस्तु का जनम होता है। जिसका उदहारण हमारे शाश्त्रो में समुन्द्र मंथन से दिया गया है। समुन्द्र मंथन के समय सागर के मंथन से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की जनम हुआ था जिसमे विष और अमृत की उल्लेख प्रमुख्य है।
गृहस्त जीवन में भी जब एक पुरूष अपनी स्त्री के साथ मैथुन करता है, अपने वीर्य को स्त्री के बीज के साथ मंथन करता है तो एक बालक के रूप में नए जीवन की निर्माण होता है। इसलिए मैथुन करने से तंत्र में कुछ नया निर्माण करने की बात कही गई है।
जब एक तांत्रिक मैथुन करता है तब वह स्वयं अपने शरीर (ब्र्ह्म/ शिव ) तथा अपनी आत्मा ( शक्ति / शिवा) का मंथन करता है। तथा उस मंथन को सही ढंग से करने के उपरांत ही इश्वर को पाने के नए नए रास्तो की निर्माण करता है।
हमारे हिंदू धर्म में सभी चीजों की खोज बहुत पहले ही हो चुकी है। परन्तु जब आज वोही पुरानी चीजे आधुनिक वैज्ञानिक फ़िर से दुनिया को बता रहे हैं तो हमें आश्चर्य होता है। मैं यहाँ कुछ उदहारण देता हूँ।
आधुनिक युग का रेडियो जिसे हम कुछ वर्षो से जानते हैं , हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्राचीन काल से साधना और ध्यानमग्न मात्र होने से ही दूर बैठे मनुष्य से वार्तालाप हो जाता था। तांत्रिक साधना में एक तांत्रिक रेडियो के सामान ही सही समय पर सही किरणों के प्रभाव से दूर दूर बैठे लोगों के साथ जुड़ सकता है। इस प्रकार वह प्राणियों के कष्ट को दूर करता है। तंत्र साधन की वजह से तांत्रिक इन किरणों से ध्यान मग्न हो कर अपनी आन्तरिक शक्ति भी बढ़ता है।
तंत्र क्रिया सदेव ही प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलती है। यह पूरा संसार ही एक तांत्रिक क्रिया है। तांत्रिक क्रिया पञ्च मकार से मिल कर ही पूरी होती है। पञ्च मकार यानि तंत्र क्रिया के पाँच स्तम्भ।
मॉस, मतस्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन तांत्रिक क्रिया के पञ्च मकार हैं। तथा बिना इन पञ्च मकार के सम्मिलन से श्रृष्टि में जीवन का सञ्चालन असंभव है।
मॉस: इस श्रृष्टि में प्राणी का जनम ही मॉस के लोथडे के रूप में हुआ है। ऐसा कोई भी प्राणी नही है जो पञ्च मकर के प्रथम " म" मॉस से वंचित रह कर जीवन यापन कर सके। मॉस के रूप में ही मनुष्य एवं जीवों की अपने माँ के गर्भ से उत्पत्ति हुई है। हर प्राणी किसी न किसी प्रकार मॉस का उपयोग अपने दैनिक क्रिया में करता है। चाहे वह भोजन में मॉस का लेना हो या फ़िर किसी को छूना, देखना या महसूस करना सभी में मॉस की प्राथमिकता है।
जब माँ के गर्भ में जीवन का विकास होता है तब उसका सबसे पहला वजूद मॉस के रूप में ही होता है। इस से सिद्ध होता है की जीवन की शुरुवात ही पञ्च मकार के प्रथम " म " से होती है।
मतस्य: मतस्य का शाब्दिक अर्थ मछली से होता है। परन्तु तंत्र क्रिया में अथवा पञ्च मकार में मतस्य का मतलब चंचलता या गति से होता है। जिस प्रकार मछली अपने जीवनपर्यंत गतिमान रहती है और पानी के विपरीत दिशा में तैरते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार तंत्र साधना के अनुसार बिना गति के कोई भी जीव इस संसार में रह नही सकता। पञ्च मकार के मॉस गुण के प्राणी में आने के बाद मतस्य गुण का होना एक मॉस को गति प्रदान करता है। पञ्च मकार के दुसरे मकार " मतस्य" से ही संसार में जीवो को हमेशा आगे बढ़ने की इक्षा मिलती हैं । मतस्य गुण ही व्यक्ति को नए कार्यो के प्रति प्रगतिशील बनता है।
मुद्रा: तंत्र में मुद्रा के दो रूप हैं।
१> मुद्रा यानी किसी प्रकार की क्रिया जो व्यक्त की जा सके। जैसे योनी मुद्रा, लिंग मुद्रा, ज्ञान मुद्रा।
२> मुद्रा का मतलब खाद्य पदार्थ से भी है। जैसे चावल के पिण्ड
पञ्च मकार के मॉस, मतस्य गुण धारण करने के बाद जीव में सही मुद्रा (क्रिया) के ज्ञान का होना अति आवश्यक है। और सही क्रिया को करने के लिए सही मुद्रा ( खाद्द्य पदार्थ ) की भी आवश्यकता है।
जब गर्भ में जीव गति प्राप्त कर लेता है तब वह अपने हाथ और पैर को अपने गर्दन के चारो और बाँध कर एक मुद्रा धारण करता है। जैसे ही वह अपनी माता द्वारा ग्रहण किया गया भोजन को अपना आहार बनाता है, उसके हाथ पैर में गति आ जाती है। यह पञ्च मकार के तीसरे " म " का श्रेष्ठ उदहारण है।
मदिरा : तंत्र में मदिरा का अर्थ "नशा" है। आम मनुष्य मदिरा पीने वाले नशे को ही तंत्र से जोड़ते हैं। परन्तु सही मायने में पञ्च मकार में मदिरा रुपी नशे को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होने वाली लगन को कहते हैं। इश्वर की भक्ति को प्राप्त करने का नशा ही तांत्रिक को कठिन से कठिन साधना पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीव को आगे बढ़ने के लिए स्वयं में मदिरा गुण को लाना अति आवश्यक है।
पञ्च मकार के यह चारों गुन जब साथ मिलते हैं तो वह जीव मॉस (शरीर ), मतस्य (गति),मुद्रा (क्रिया,आहार )और मदिरा (नशा) के आने के बाद अपने जीवन में कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
जब बालक अपने माँ के गर्भ में बड़ा हो रहा होता है तो वह समय उसके लिए बहुत कष्टकारी होता है। माँ के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन उसकी कोमल त्वचा को चोट पहुचाता है। गति आने के बाद और माँ से आहार मिलने के बाद वह जीव स्वयं को इस कष्ट से निकलने के लिए इश्वर से प्राथना करता है। उसके अन्दर मदिरा गुण का प्रवेश होते ही वह अपने कष्ट को दूर करने के लिए इश्वर की प्रार्थना में ली
मैथुन:मैथुन का अर्थ है "मथना " तंत्र में मैथुन का बहुत महत्त्व है। परन्तु इसे किस प्रकार अपने जीवन में अपनाना है वह जानना बहुत जरुरी है। अधिकतर लोगों को तंत्र के बारे में यह भ्रान्ति है की यहाँ तांत्रिक को मैथुन करने की छुट है। मैं यहाँ पञ्च मकार के इस पांचवे और बहुत ही महत्व्य्पूर्ण " म " के बारे में बताना चाहता हूँ।
तंत्र में यह कहा गया है की इस संसार में पाई जाने वाली हर वस्तु को यदि सही प्रकार से मथा जाए तो एक नई वस्तु का जनम होता है। जिसका उदहारण हमारे शाश्त्रो में समुन्द्र मंथन से दिया गया है। समुन्द्र मंथन के समय सागर के मंथन से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की जनम हुआ था जिसमे विष और अमृत की उल्लेख प्रमुख्य है।
गृहस्त जीवन में भी जब एक पुरूष अपनी स्त्री के साथ मैथुन करता है, अपने वीर्य को स्त्री के बीज के साथ मंथन करता है तो एक बालक के रूप में नए जीवन की निर्माण होता है। इसलिए मैथुन करने से तंत्र में कुछ नया निर्माण करने की बात कही गई है।
जब एक तांत्रिक मैथुन करता है तब वह स्वयं अपने शरीर (ब्र्ह्म/ शिव ) तथा अपनी आत्मा ( शक्ति / शिवा) का मंथन करता है। तथा उस मंथन को सही ढंग से करने के उपरांत ही इश्वर को पाने के नए नए रास्तो की निर्माण करता है।
Wednesday, 6 May 2009
तंत्र में बलि की प्रमुख्यता क्यों?
हिंदू धर्म में सिर्फ़ वाम मार्ग ही ऐसा मार्ग है जिसमें त्याग की बात कम कही गई है और बलि पर अधिक से अधिक ज़ोर दिया गया है। यहाँ मैं बलि और त्याग में जो एक महीन अन्तर है वह पहले व्यक्त करता हूँ।
त्याग का मतलब है किस को छोड़ देना परन्तु अगर मौका मिले तो फ़िर से त्याग की गई वस्तु वापस अपनाई जा सकती है। सनातन धर्म के अधिकतर संप्रदाय में त्याग को महत्त्व दिया गया है। परन्तु सिर्फ़ वाम मार्ग में बलि को प्राथमिकता दी गई है। बलि क्यों?? बलि का मतलब होता है किसी का अंत। इसलिए तंत्र में बलि की महत्वता है। क्योंकि बलि की गई वस्तु वापस नही आ सकती है। त्याग की गई वस्तु को वापस अपनाया जा सकता है पर बलि देने के बाद हम उस वस्तु को पहले के सामान कभी भी अपना नही सकते।
आम साधक बलि का सही भावार्थ नही समझ पाते हैं। बलि को हमेशा किसी प्राणी के अंत से ही देखा जाता है। परन्तु सही रूप में बलि तो हमें अपने अन्दर छिपे दोष और अवगुणों का देना चाहिए। वाम मार्ग में तथा तंत्र में एक सही साधक हमेशा अपने अवगुणों की ही बलि देता है। हमेशा भटके हुए साधक, जिन्हे तंत्र का पूरा ज्ञान नही है वह दुसरे जीवों की बलि दे कर समझते हैं की उन्होंने इश्वर को प्रसन्न कर दिया। पर माँ काली का कहना है की उन्हे साधक के अवगुणों की बलि चाहिए ना की मूक जीवों की।
त्यागी व्यक्ति को हमेशा यह भय रहता है की कही वह अपनी त्याग की गई वस्तु, आदत को वापस न अपना लें। इसलिए त्यागी संत या साधक पूरी तरह से निर्भय नही हो पाते हैं। परन्तु तांत्रिक साधक जब बलि दे देता है तो वह भयहीन हो जाता है। इसलिए वह बलि देने के बाद माँ के और समीप हो जाते है।
यदि एक उच्च कोटि का साधक बनना है तो बलि देने की आदत जरुरी है। बलि का मतलब यहाँ हिंसा से कभी भी नही है।
एक सफल साधक साधना में लीनं होने के लिए निम्न प्रकार की बलि देता है:
१> निजी मोह की बलि देता है।
२> निजी वासना की बलि देता है।
३> लज्जा की बलि देता है।
४> क्रोध की बलि देता है।
इसलिए त्याग से उत्तम बलि देना होता है। जो मनुष्य गृहस्थ आश्रम में है तथा सामान्य भक्ति करते हैं वह अपने जीवन में अगर कुछ हद तक मोह,वासना,ईष्या, और क्रोध की बलि दें तो वह इश्वर के समीप जा सकते है और उनका जीवन सफल होता है।
त्याग का मतलब है किस को छोड़ देना परन्तु अगर मौका मिले तो फ़िर से त्याग की गई वस्तु वापस अपनाई जा सकती है। सनातन धर्म के अधिकतर संप्रदाय में त्याग को महत्त्व दिया गया है। परन्तु सिर्फ़ वाम मार्ग में बलि को प्राथमिकता दी गई है। बलि क्यों?? बलि का मतलब होता है किसी का अंत। इसलिए तंत्र में बलि की महत्वता है। क्योंकि बलि की गई वस्तु वापस नही आ सकती है। त्याग की गई वस्तु को वापस अपनाया जा सकता है पर बलि देने के बाद हम उस वस्तु को पहले के सामान कभी भी अपना नही सकते।
आम साधक बलि का सही भावार्थ नही समझ पाते हैं। बलि को हमेशा किसी प्राणी के अंत से ही देखा जाता है। परन्तु सही रूप में बलि तो हमें अपने अन्दर छिपे दोष और अवगुणों का देना चाहिए। वाम मार्ग में तथा तंत्र में एक सही साधक हमेशा अपने अवगुणों की ही बलि देता है। हमेशा भटके हुए साधक, जिन्हे तंत्र का पूरा ज्ञान नही है वह दुसरे जीवों की बलि दे कर समझते हैं की उन्होंने इश्वर को प्रसन्न कर दिया। पर माँ काली का कहना है की उन्हे साधक के अवगुणों की बलि चाहिए ना की मूक जीवों की।
त्यागी व्यक्ति को हमेशा यह भय रहता है की कही वह अपनी त्याग की गई वस्तु, आदत को वापस न अपना लें। इसलिए त्यागी संत या साधक पूरी तरह से निर्भय नही हो पाते हैं। परन्तु तांत्रिक साधक जब बलि दे देता है तो वह भयहीन हो जाता है। इसलिए वह बलि देने के बाद माँ के और समीप हो जाते है।
यदि एक उच्च कोटि का साधक बनना है तो बलि देने की आदत जरुरी है। बलि का मतलब यहाँ हिंसा से कभी भी नही है।
एक सफल साधक साधना में लीनं होने के लिए निम्न प्रकार की बलि देता है:
१> निजी मोह की बलि देता है।
२> निजी वासना की बलि देता है।
३> लज्जा की बलि देता है।
४> क्रोध की बलि देता है।
इसलिए त्याग से उत्तम बलि देना होता है। जो मनुष्य गृहस्थ आश्रम में है तथा सामान्य भक्ति करते हैं वह अपने जीवन में अगर कुछ हद तक मोह,वासना,ईष्या, और क्रोध की बलि दें तो वह इश्वर के समीप जा सकते है और उनका जीवन सफल होता है।
Sunday, 26 April 2009
क्या है तंत्र, मंत्र, यन्त्र,तांत्रिक, और तंत्र साधना...
यह पोस्ट मैं उन सभी लोगों के लिए लिख रहा हूँ जो तंत्र साधना ,तांत्रिक तथा वाम मार्गी के बारे में जानना चाहते है। यह पोस्ट उन लोगों के लिए भी है जिनके मन में तंत्र से जुडे कुछ संदेह हैं। तथा यह उन लोगों के लिए भी हैं जो हमारे हिंदू संस्कृति की सही खोज में लगे हैं।
यहाँ मैं बहुत ही सरल रूप में तंत्र, मंत्र, यन्त्र, तांत्रिक, तांत्रिक साधना,तांत्रिक क्रिया अथवा पञ्च मकार के बारे में संचिप्त में वर्णन करूँगा। तंत्र एक विज्ञानं है जो प्रयोग में विश्वास रखता है। इसे विस्तार में जानने के लिए एक सिद्ध गुरु की आवश्यकता है। अतः मैं यहाँ सिर्फ़ उसके सूक्ष्म रूप को ही दर्शा रहा हूँ।
पार्वतीजी ने महादेव शिव से प्रश्न किया की हे महादेव, कलयुग मे धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा?
उनके इस प्रश्न के उत्तर मे महादेव शिव ने उन्हे समझते हुए जो भी व्यक्त किया तंत्र उसी को कहते हैं।
योगिनी तंत्र मे वर्णन है की कलयुग मे वैदिक मंत्र विष हीन सर्प के सामान हो जाएगा। ऐसा कलयुग में शुद्ध और अशुद्ध के बीच में कोई भेद भावः न रह जाने की वजह से होगा। कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रो का कलयुग में उच्चारण करेगा उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के सामान होगी जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर कुआँ खोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में अपना समय और उर्जा को व्यर्थ करता है। कलयुग में वैदिक मंत्रो का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा। और गृहस्त लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा। महादेव ने बताया की वैदिक मंत्रो का पूर्ण फल सतयुग, द्वापर तथा त्रेता युग में ही मिलेगा.
तब माँ पार्वती ने महादेव से पुछा की कलयुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे? और जो फल उन्हे पूजा अर्चना से मिलता है वह उन्हे कैसे मिलेगा?
इस पर शिव जी ने कहा की कलयुग में तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगा। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जाएगा। वह अपने तरीके से इश्वर को प्राप्त करने के लिए अनेको प्रकार के विज्ञानिक प्रयोग करेगा।
परन्तु ऐसा करने के लिए साधक के अन्दर इश्वर को पाने का नशा और प्रयोगों से कुछ प्राप्त करने की तीव्र इच्षा होनी चाहिए। तंत्र के प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एक तांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का ज्ञान जरुरी है।
मंत्र: मंत्र एक सिद्धांत को कहते हैं। किसी भी आविष्कार को सफल बनाने के लिए एक सही मार्ग और सही नियमों की आवश्यकता होती है। मंत्र वही सिद्धांत है जो एक प्रयोग को सफल बनाने में तांत्रिक को मदद करता है। मंत्र द्वारा ही यह पता चलता है की कौन से तंत्र को किस यन्त्र में समिलित कर के लक्ष्य तक पंहुचा जा सकता है।
मंत्र के सिद्ध होने पर ही पूरा प्रयोग सफल होता है। जैसे क्रिंग ह्रंग स्वाहा एक सिद्ध मंत्र है।
मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मंत्र में मन का अर्थ है मनन करना अथवा ध्यानस्त होना तथा त्र का अर्थ है रक्षा। इस प्रकार मंत्र का अर्थ है ऐसा मनन करना जो मनन करने वाले की रक्षा कर सके। अर्थात मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है।
तंत्र: श्रृष्टि में इश्वर ने हरेक समस्या का समाधान स्वयम दिया हुआ है। ऐसी कोई बीमारी या परेशानी नही जिसका समाधान इश्वर ने इस धरती पर किसी न किसी रूप में न दिया हो। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं। इस समाहार से बनने वाली उस औषधि या वस्तु से प्राणियों का कल्याण होता है।
तंत्र तन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। जो वस्तु इस तन की रक्षा करे उसे ही तंत्र कहते हैं।
यन्त्र: मंत्र और तंत्र को यदि सही से प्रयोग किया जाए तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। पर तंत्र के रसायनों को एक उचित पात्र को आवश्यकता होती है। ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र मन गया है। आसन, तलिस्मान, ताबीज इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार को आकृति को भी यन्त्र मन गया है। जैसे श्री यन्त्र, काली यन्त्र, महा मृतुन्जय यन्त्र इत्यादि।
यन्त्र शब्द यं तथा त्र के मिलाप से बना है। यं को पुर्व में यम यानी काल कहा जाता था। इसलिए जो यम से हमारी रक्षा करे उसे ही यन्त्र कहा जाता है।
इसलिए एक सफल तांत्रिक साधक को मंत्र, तंत्र और यन्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। विज्ञानं के प्रयोगों जैसे ही यदि तीनो में से किसी की भी मात्रा या प्रकार ग़लत हुई तो सफलता नही मिलेगी।
यहाँ मैं बहुत ही सरल रूप में तंत्र, मंत्र, यन्त्र, तांत्रिक, तांत्रिक साधना,तांत्रिक क्रिया अथवा पञ्च मकार के बारे में संचिप्त में वर्णन करूँगा। तंत्र एक विज्ञानं है जो प्रयोग में विश्वास रखता है। इसे विस्तार में जानने के लिए एक सिद्ध गुरु की आवश्यकता है। अतः मैं यहाँ सिर्फ़ उसके सूक्ष्म रूप को ही दर्शा रहा हूँ।
पार्वतीजी ने महादेव शिव से प्रश्न किया की हे महादेव, कलयुग मे धर्म या मोक्ष प्राप्ति का क्या मार्ग होगा?
उनके इस प्रश्न के उत्तर मे महादेव शिव ने उन्हे समझते हुए जो भी व्यक्त किया तंत्र उसी को कहते हैं।
योगिनी तंत्र मे वर्णन है की कलयुग मे वैदिक मंत्र विष हीन सर्प के सामान हो जाएगा। ऐसा कलयुग में शुद्ध और अशुद्ध के बीच में कोई भेद भावः न रह जाने की वजह से होगा। कलयुग में लोग वेद में बताये गए नियमो का पालन नही करेंगे। इसलिए नियम और शुद्धि रहित वैदिक मंत्र का उच्चारण करने से कोई लाभ नही होगा। जो व्यक्ति वैदिक मंत्रो का कलयुग में उच्चारण करेगा उसकी व्यथा एक ऐसे प्यासे मनुष्य के सामान होगी जो गंगा नदी के समीप प्यासे होने पर कुआँ खोद कर अपनी प्यास बुझाने की कोशिश में अपना समय और उर्जा को व्यर्थ करता है। कलयुग में वैदिक मंत्रो का प्रभाव ना के बराबर रह जाएगा। और गृहस्त लोग जो वैसे ही बहुत कम नियमो को जानते हैं उनकी पूजा का फल उन्हे पूर्णतः नही मिल पायेगा। महादेव ने बताया की वैदिक मंत्रो का पूर्ण फल सतयुग, द्वापर तथा त्रेता युग में ही मिलेगा.
तब माँ पार्वती ने महादेव से पुछा की कलयुग में मनुष्य अपने पापों का नाश कैसे करेंगे? और जो फल उन्हे पूजा अर्चना से मिलता है वह उन्हे कैसे मिलेगा?
इस पर शिव जी ने कहा की कलयुग में तंत्र साधना ही सतयुग की वैदिक पूजा की तरह फल देगा। तंत्र में साधक को बंधन मुक्त कर दिया जाएगा। वह अपने तरीके से इश्वर को प्राप्त करने के लिए अनेको प्रकार के विज्ञानिक प्रयोग करेगा।
परन्तु ऐसा करने के लिए साधक के अन्दर इश्वर को पाने का नशा और प्रयोगों से कुछ प्राप्त करने की तीव्र इच्षा होनी चाहिए। तंत्र के प्रायोगिक क्रियाओं को करने के लिए एक तांत्रिक अथवा साधक को सही मंत्र, तंत्र और यन्त्र का ज्ञान जरुरी है।
मंत्र: मंत्र एक सिद्धांत को कहते हैं। किसी भी आविष्कार को सफल बनाने के लिए एक सही मार्ग और सही नियमों की आवश्यकता होती है। मंत्र वही सिद्धांत है जो एक प्रयोग को सफल बनाने में तांत्रिक को मदद करता है। मंत्र द्वारा ही यह पता चलता है की कौन से तंत्र को किस यन्त्र में समिलित कर के लक्ष्य तक पंहुचा जा सकता है।
मंत्र के सिद्ध होने पर ही पूरा प्रयोग सफल होता है। जैसे क्रिंग ह्रंग स्वाहा एक सिद्ध मंत्र है।
मंत्र मन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। मंत्र में मन का अर्थ है मनन करना अथवा ध्यानस्त होना तथा त्र का अर्थ है रक्षा। इस प्रकार मंत्र का अर्थ है ऐसा मनन करना जो मनन करने वाले की रक्षा कर सके। अर्थात मन्त्र के उच्चारण या मनन से मनुष्य की रक्षा होती है।
तंत्र: श्रृष्टि में इश्वर ने हरेक समस्या का समाधान स्वयम दिया हुआ है। ऐसी कोई बीमारी या परेशानी नही जिसका समाधान इश्वर ने इस धरती पर किसी न किसी रूप में न दिया हो। तंत्र श्रृष्टि में पाए गए रासायनिक या प्राकृतिक वस्तुओं के सही समाहार की कला को कहते हैं। इस समाहार से बनने वाली उस औषधि या वस्तु से प्राणियों का कल्याण होता है।
तंत्र तन तथा त्र शब्दों से मिल कर बना है। जो वस्तु इस तन की रक्षा करे उसे ही तंत्र कहते हैं।
यन्त्र: मंत्र और तंत्र को यदि सही से प्रयोग किया जाए तो वह प्राणियों के कष्ट दूर करने में सफल है। पर तंत्र के रसायनों को एक उचित पात्र को आवश्यकता होती है। ताकि साधारण मनुष्य उस पात्र को आसानी से अपने पास रख सके या उसका प्रयोग कर सके। इस पात्र या साधन को ही यन्त्र कहते हैं। एक ऐसा पात्र जो तंत्र और मन्त्र को अपने में समिलित कर के आसानी से प्राणियों के कष्ट दूर करे वही यन्त्र है। हवन कुंड को सबसे श्रेष्ठ यन्त्र मन गया है। आसन, तलिस्मान, ताबीज इत्यादि भी यंत्र माने जाते है। कई प्रकार को आकृति को भी यन्त्र मन गया है। जैसे श्री यन्त्र, काली यन्त्र, महा मृतुन्जय यन्त्र इत्यादि।
यन्त्र शब्द यं तथा त्र के मिलाप से बना है। यं को पुर्व में यम यानी काल कहा जाता था। इसलिए जो यम से हमारी रक्षा करे उसे ही यन्त्र कहा जाता है।
इसलिए एक सफल तांत्रिक साधक को मंत्र, तंत्र और यन्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। विज्ञानं के प्रयोगों जैसे ही यदि तीनो में से किसी की भी मात्रा या प्रकार ग़लत हुई तो सफलता नही मिलेगी।
Tuesday, 7 April 2009
हमारे शरीर के अंगो पर तिल के होने का महत्त्व
हमारे शरीर पर कई प्रकार के जन्मजात अथवा जीवन काल के दौरान निकले निशान पाए जाते हैं। जिन्हे हम तिल, मस्सा एवं लाल मस्सा के नाम से सुनते आए हैं। शास्त्रों के अनुसार हमारे शरीर पर पाए गए यह निशान हमारे भविष्य और चरित्र के बारे में बहुत कुछ दर्शाते हैं। मैं आज शरीर पर इन तिलों के होने का महत्त्व वर्णन कर रहा हूँ।
अपने २० साल के अनुभव से तथा अनेक लोगों पर परिक्षण करने के उपरांत ही मैं इस अनुभव को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
तिल तथा मस्से का होना दोनों एक ही प्रभाव देता है। तिल आपके सभी प्रकार के शारीरिक, आर्थिक एवं चरित्र के बारे में काफी कुछ दर्शा देता है। तिल का प्रभाव हमारे लिंग से कभी भी अलग नही होता। तिल का प्रभाव स्त्री एवं पुरूष दोनों के लिए एक सामान होता है.
मस्तक ,माथा अथवा ललाट :
१> ललाट के मध्य भाग में तिल का होना भाग्यवान माना जाता है।
२> ललाट पर बाएँ भंव के ऊपर तिल होना विलासिता को दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति अपने रखे धन सम्पति को विलासिता में लिप्त होकर बरबाद कर देते हैं।
३> ललाट पर दाँए भंव के ऊपर तिल होना भी विलासिता को दर्शाता है परन्तु ऐसे व्यक्ति स्वयं धन अर्जित कर के उसे बरबाद कर देते हैं।
कान अथवा कर्ण:
१> बाएँ कान के सामने की तरफ़ कहीं भी तिल का होना व्यक्ति के रहस्यमयी होने के गुण को दर्शाता है। साथ ही साथ ऐसे व्यक्ति का विवाह अधिक उम्र होने के पश्चात् होता है।
२> बाएँ कान के पीछे की तरफ़ तिल का होना व्यक्ति के ग़लत कार्यो के प्रति झुकाव को दर्शाता है।
३> दाँए कान के सामने की तरफ़ कही भी तिल हो तो वह व्यक्ति बहुत कम आयु में ही धनवान हो जाता है। साथ ही साथ व्यक्ति का जीवन साथी सुंदर होता है।
४> दाँए कान के पीछे अगर तिल है तो यह तिल कान में किसी भी प्रकार के रोग होने की सम्भावना व्यक्त करता है।
आँख,नेत्र अथवा नयन:
१> बाएँ आँख के भीतर सफ़ेद भाग में तिल का होना चरित्र हीनता का सूचक है।
२> बाएँ आँख के पुतली पर तिल का होना भी चरित्र हीनता का सूचक है परन्तु इसका प्रभाव भीतर के तिल से कम होता है।
३> बाएँ आँख की नीचे की पलकों पर तिल होना व्यक्ति के आलसीपन और विलासी चरित्र को दर्शाता है। ४> दाँए आँख के भीतर सफ़ेद भाग में अगर तिल हो तो वह व्यक्ति भी चरित्रहीन होता है अथवा ऐसे व्यक्ति के जीवन का अंत या तो हत्या से होता है या फ़िर वह आत्मदाह कर लेता है
५> दाँए आँख के ऊपर का तिल आँखों से सम्बंधित रोग का सूचक है। एवं ऐसे व्यक्ति अविश्वासी होते हैं। ना यह किसी पर विश्वास करते है और न ही विश्वास के पात्र होते हैं।
६> दाँए आँख के नीचे की पलकों पर तिल का होना उस व्यक्ति के कम आयु से ही विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण का सूचक है।
नाक:
१> नाक के अग्र भाग पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति लक्ष्य बना कर चलने वाले होते हैं तथा किसी भी कार्य को उस समय तक नही करते जब तक की वह उस कार्य के लिए स्वयं को पूर्ण सुरक्षित महसूस न कर लें। साथ ही साथ यह व्यक्ति भी विपरीत लिंग के प्रति बहुत आकर्षित होता है।
२> इसके अलावा अगर नाक पर कहीं भी तिल हो तो व्यक्ति को नाक सम्बंधित कोई भी रोग हो सकता है।
३> नाक के नीचे (मूछ वाली जगह ) पर दाँए अथवा बाएँ अगर कहीं भी तिल हो वह व्यक्ति भी अधिक विलासी होगा तथा नींद बहुत अधिक पसंद करेगा।
होंठ:
१> उपरी होंठ के बाएँ तरफ़ तिल होना जीवनसाथी के साथ लगातार विवाद होने का सूचक है।
२> उपरी होंठ के दाँए तरफ़ तिल हो तो जीवनसाथी का पूर्ण साथ मिलता है।
३> निचले होंठ के बाएँ तरफ़ तिल होना किसी विशेष रोग के होने का सूचक होता है एवं ऐसे व्यक्ति अच्छे भोजन खाने तथा नए वस्त्र पहनने के शौकीन होते हैं।
४> निचले होंठ के दाँए तरफ़ तिल हो तो वह व्यक्ति अपने क्षेत्र में बहुत प्रसिद्दि प्राप्त करते हैं। साथ ही साथ इन्हे भोजन से कोई खास लगाव नही होता है। लेकिन विपरीत लिंग इन्हे अधिक आकर्षित करते हैं।
गाल:
१> जिस व्यक्ति के बाएँ गाल,नाक तथा ठुड्डी पर तीनो जगह तिल हो तो ऐसे व्यक्ति के पास स्थायी धन हमेशा रहता है। परन्तु अगर सिर्फ़ कही एक जगह ही तिल हो तो उसे पैसे का आभाव नही होता।
२> इसी प्रकार दाँए गाल,नाक तथा ठुड्डी पर तीनो जगह तिल हो तो ऐसे व्यक्ति भी धनवान होते हैं परन्तु घमंडी भी होते हैं। एसऐ व्यक्ति अपना धन किसी भी सामाजिक कार्य में नही लगते हैं। परन्तु अगर सिर्फ़ कही एक जगह ही तिल हो तो उसे पैसे का आभाव नही होता।
३> दाँए गाल पर तिल होना व्यक्ति के घमंडी होने का सूचक है।
कंठ,गला तथा गर्दन:
१> कंठ पर तिल का होना सुरीली आवाज़ का सूचक है तथा ऐसा व्यक्ति संगीत में रूचि रखता है।
२> गले पर और कहीं भी तिल होने वाले व्यक्ति संगीत के शौखिन होते हैं परन्तु उन्हे गले सम्बंधित रोग एवं कुछ व्यक्तियों में दमा जैसे रोग भी पाए गए हैं।
३> अगर गले के नीचे तिल हो तो ऐसा व्यक्ति गायक होता है। एवं उसकी आवाज़ बहुत सुरीली होती है। ४> गले के पीछे अगर तिल हो तो रीढ़ सम्बंधित रोग होते हैं।
सीना अथवा छाती:
1> बाएँ तरफ़ सीने में तिल का होना सीने या ह्रदय रोग की शिकायत होने एवं मध्यस्तर के जीवनसाथी का मिलना तथा अधिक उम्र में शादी होने की स्थिति को दर्शाता है। वक्ष स्थल पर यदि तिल हो तो वह व्यक्ति अधिक कामुक होता है और अनेको प्रकार की बदनामी को झेलता है।
२> दाँए तरफ़ सीने में तिल का होने से सुंदर जीवनसाथी मिलता है एवं यह व्यक्ति धनवान भी होता है। परन्तु यदि तिल वक्ष स्थल पर है तो इसका प्रभाव भी बाएँ तिल के सामान होता है।
उदर अथवा पेट:
१> उदर के बाएँ तरफ़ तिल होना पेट सम्बन्धी रोगों का सूचक है एवं अधिकतम लोगो में पाया गया है की उन्हे शल्य चिकित्सा भी करनी पड़ी है। ऐसे लोग भोजन अधिक नही कर पाते है।
२> उदर के दाँए तरफ़ तिल होना व्यक्ति के भोजन के प्रति अधिक लगाव को दर्शाता है। साथ ही साथ यह आरामदेह व्यक्ति होते हैं।
३> नाडी के बीचोबीच तिल का होना नाडी सम्बंधित रोगों तथा लकवे की बीमारी के होने का सूचक है।
४> नाडी के नीचे तिल यदि हो तो वह व्यक्ति कम आयु में ही मैथुन क्रिया में कमजोर हो जाता है एवं अप्पेंधिक्स और होर्निया जैसे रोगों से पीड़ित होने की संभावना अधिक रहती है।
गुप्तांग:
१> पुरूष के गुप्तांग पर यदि तिल हो तो वह पुरूष अधिक कामुक एवं एक से अधिक स्त्रियों के संपर्क में रहता है।साथ ही साथ उस व्यक्ति हो पुत्र प्राप्ति की सम्भावना अधिक होती है एवं ४५-५० के बीच की आयु में उसे शिथिल इन्द्रियों का रोग हो जाता है।
२> स्त्री के गुप्तांग पर यदि बाएँ तरफ़ तिल है तो वह स्त्री अधिक कामुक, कम आयु से ही विपरीत लिंग के संपर्क में अधिक रहना अथवा इन्द्रियों सम्बंधित रोगों से पीड़ित होती हैं।ऐसी स्त्रियाँ कन्या को अधिक जनम देती हैं।यदि तिल दाँए तरफ़ है तो यह भी अधिक कामुक होती है तथा गुप्तांग में किसी प्रकार की फंगल रोग से पीड़ित हो जाती हैं। परन्तु ऐसी स्त्रियाँ कन्या से अधिक पुत्र को जनम देती हैं। तिल के अग्र्र भाग में नीचे होने पर वह स्त्री भी कामुक होती है पर वह कम आयु में ही विधवा हो जाती है।
हाथ, उंगलियाँ अथवा भुजा:
१> हाथ के पंजे में अगर किसी भी ग्रह के स्थान पर यदि तिल है तो वह उसे ग्रह को कमजोर करता है तथा हानि ही करता है। तिल हाथपर अन्दर की तरफ हो या फ़िर बहार की तरफ़ प्रभाव यही रहता है। कुछ लोगों को यह भ्रान्ति है की हाथ के पंजे का तिल शुभ होता है। परन्तु ऐसा नही होता।
२> तर्जनी ऊँगली (पहली ऊँगली ) पर कहीं भी तिल हों तो ऐसा व्यक्ति कितना भी धन कमाए उसके पास पैसा कभी नही टिकता। ऐसे व्यक्ति को आँखों में कमजोरी की शिकायत रहती है तथा कम आत्मविश्वाशी होता है।
तर्जनी ऊँगली के नीचे बृहस्पत का पर्वत होता है इसलिए अगर उस पर्वत पर तिल है तो वह व्यक्ति अपने पूर्वजो के रखे हुए धन को भी गवा देता है तथा अंत समय में दरिद्र होके रहता है।
३> मध्यमा ऊँगली में कही भी तिल है तो यह व्यक्ति अनेको बार दुर्घटना का शिकार होता है, एवं पुलिस, थाना अथवा कचहरी का आना जाना लगा रहता है। ऐसे व्यक्ति को जीवन भर हर कार्य के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है साथ ही साथ कोई भी काम में स्थिर नही रह पता है। मध्यमा उंगली के नीचे शनि का पर्वत होता है। शनि पर यदि तिल है तो इस व्यक्ति की आकाल मृत्यु अवश्य निश्चित हैअन्यथा उसे आजीवन कारावास झेलना निश्चित है।
४> अनामिका ऊँगली में कही भी तिल होंतो ऐसे व्यक्ति का पढ़ाई में मन कम लगता है तथा उसकी प्रतिभा धूमिल होती है। ऐसे व्यक्ति ह्रदय सम्बन्धी रोग का शिकार होते हैं। अनामिका ऊँगली के नीचे सूर्य का पर्वत होता है। अगर इस पर्वत पर तिल है तो यह व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी कार्य में सफल नही होता है। साथ ही साथ बदनामी भी झेलनी पड़ती है और मृत्यु ह्रदय रोग से होती है।
५> कानी अथवा कनिष्क ऊँगली पर यदि तिल हों तो ऐसे व्यक्ति का अपने जीवनसाथी के साथ हमेशा विवाद होता रहता है, साथ ही उसे चर्म रोग ( सफ़ेद दाग ) की शिकायत रहती है। कानी ऊँगली के नीचे बुद्ध का पर्वत होता है.यदि तिल इस पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति की शल्य चिकित्सा जरुर होती है। ऐसे स्त्रियों के बच्चे भी शल्य चिकत्सा के बाद होते है।
६> अंगूठे पर तिल होने पर उस व्यक्ति को यश नही मिलता। अंगूठे के नीचे शुक्र का पर्वत होता है। यदि शुक्र पर्वत पर तिल है तो ऐसे व्यक्ति को गुप्त रोगों की शिकायत रहती है।ऐसे लोगों को पुत्र कष्ट होता है।
७> यदि जीवनरेखा पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति की कम आयु में ही किसी विशेष रोग से मृत्यु होती है। शुक्र और बृहस्पत पर्वत के बीच में मंगल का स्थान होता है, इस स्थान पर यदि तिल हो तो उस व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की सम्भावना रहती है। यदि दिमाग रेखा पर तिल हो ऐसे व्यक्ति भी मस्तक सम्बन्धी रोग से पीड़ित होते है साथ ही साथ नौकरी में अनेको प्रकार की बाधाएं होती हैं। ह्रदय रेखा पर यदि तिल हो तो ह्रदय सम्बन्धी रोगों के कारन कम आयु में ही मृत्यु होती है। चन्द्र रेखा पर तिल होने पर ऐसे व्यक्ति मानसिक रोग से पीड़ित होते है एवं इनके शरीर पर तापमान का अधिक प्रभाव होता है। राहू ग्रह के पर्वत पर तिल होने पर ऐसे व्यक्ति किसी भी व्यवसाय में सफल नही होते और आजीवन उदर रोग से परेशान रहते हैं। केतु ग्रह पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति पर चरित्रहीनता का आरोप लगता रहता है तथा जोडो में आजीवन दर्द रहता है।
८ > मणिबंध ( कलाई ) पर अगर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति को यश नही मिलता है। ऐसे व्यक्ति को पुत्र कष्ट भी होता है।
यदि यही सारे तिल हाथ, उँगलियों पर ऊपर की तरफ़ हो तो सारे वही प्रभाव रहते है परन्तु उनका असर ५० प्रतिषत कम हो जाता है। यदि तिल दाँए हाथ में है तो किसी पूजा या अनुष्ठान से उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है परन्तु यदि वही तिल बाएँ हाथ में है तो उसका प्रभाव कम नही हो सकता और व्यक्ति को उस तिल के प्रभाव झेलने ही पड़ते हैं।
९>बाएँ भुजा ( कोहनी से नीचे ) यदि कही भी तिल है तो उस व्यक्ति की पढ़ाई में बाधा उत्पन होती है एवं कई लोगों में ऐसा भी पाया गया है की उनका मन पढ़ाई से भाग जाता है। कोहनी से ऊपर अगर कही भी तिल है तो यह व्यक्ति
शारीरिक रूप से कमजोर होता है।
१०> दाँए भुजा (कोहनि से नीचे ) यदि कही भी तिल है तो यह व्यक्ति अपने कलम की कमाई खाते है यानि अपना जीवन यापन स्वयम करते हैं। यदि कोहनी से ऊपर की तरफ़ कही भी तिल है तो यह व्यक्ति बहुत साहसी होता है।
११> यदि कोहनी पर तिल है तो उस व्यक्ति को हमेशा जोडो के दर्द की तकलीफ रहेगी। बाएँ हाथ के तिल का असर कभी ख़त्म नही हो सकता है। यदि दाँए हाथ की कोहनी पर तिल है तो पूजा या उपचार करने से कष्ट दूर हो सकता है।
पैर:
१> यदि पैर पर भी हाथ की तरह उन्ही जगह पर तिल है तो सारे प्रभाव हाथ जैसे ही होते है। परन्तु माना गया है की हाथ के तिल का प्रभाव पैर के तिल से ज्यादा होता है।
२> बाएँ पैर की जांघ पर यदि तिल हो तो यह व्यक्ति भोगी होता है। एवं कुछ लोगों में बवासीर होने की शिकायत भी पाई गई है। दाँए पैर की जांघ पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति भी भोगी विलासी होते है। ऐसे व्यक्तियों को विपरीत लिंग के प्रति अधिक आकर्षण रहता है।
३> यदि घुटने पर तिल हो तो जोडो के दर्द अथवा मूत्र सम्बन्धी रोग हो सकते हैं।
पीठ:
पीठ के रीढ़ के दाए हिस्से पर उपर की तरफ़ यदि तिल हो तो यह व्यक्ति धनवान होता है एवम अपनो द्वारा अनेको बार मुसीबत आने पर मदद पता है.दाए ओर कमर से उपर यदि तिल हो तो ऐसा व्यक्ति खाने पीने का शौखिन होता है। तथा पेट के रोगों से ग्रस्त रह सकता है।यदि तिल कमर पर दाईं तरफ़ हो तो यह व्यक्ति अधिक कामुक होता है.बाएँ तरफ़ ऊपर की तरफ़ यदि तिल हो तो यह व्यक्ति बहुत कठिन परिश्रम के बाद ही पैसा कमाता है एवं अपने लोग इसे धोखा दिया करते हैं। यदि नीचे बैएँ तरफ़ तिल हो तो यह व्यक्ति आजीवन उदर रोग से ग्रस्त रहता है। तथा शल्य चिकित्सा की सम्भावना अधिक होती है। यदि तिल कमर पर हो तो यह व्यक्ति आजीवन कमर के दर्द से परेशान रहता है। तथा यदि स्त्री है तो उसे श्वेत प्रदर का रोग हो सकता है और पुरूष हो तो स्वप्नदोष की बेमारी अधिक होती है। रीढ़ पर ऊपर से नीचे यदि कहीं भी तिल हो तो रीढ़ की बीमारी या शरीर में जोडो के दर्द की शिकायत होती है। तथा ऐसे लोग हमेशा अपनों से ही धोखा खाते हैं और इनके पीठ पीछे हमेशा वार होता है। अधिकतर पाया गया है ऐसे लोग अपनों से ही धोखा खाते हैं।
हाथ के कांख:
दाँए कांख में यदि तिल हो तो यह व्यक्ति बहुत धनवान होता है तथा कंजूस भी होता है। बाएँ कांख में तिल हो तो यह व्यक्ति पैसे तो कमाते हैं लेकिन रोग और भोग में ही पैसो का नाश हो जाता है।
हिप:
यदि बाएँ हिप पर तिल हो तो यह व्यक्ति बवासीर सम्बन्धी या भगंदर सम्बन्धी रोगों से पीड़ित हो सकता है। यदि दाँए हिप पर तिल हो तो यह व्यक्ति व्यापारी है तो अपने व्यापर में बहुत आगे बढ़ता है
अपने २० साल के अनुभव से तथा अनेक लोगों पर परिक्षण करने के उपरांत ही मैं इस अनुभव को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।
तिल तथा मस्से का होना दोनों एक ही प्रभाव देता है। तिल आपके सभी प्रकार के शारीरिक, आर्थिक एवं चरित्र के बारे में काफी कुछ दर्शा देता है। तिल का प्रभाव हमारे लिंग से कभी भी अलग नही होता। तिल का प्रभाव स्त्री एवं पुरूष दोनों के लिए एक सामान होता है.
मस्तक ,माथा अथवा ललाट :
१> ललाट के मध्य भाग में तिल का होना भाग्यवान माना जाता है।
२> ललाट पर बाएँ भंव के ऊपर तिल होना विलासिता को दर्शाता है। ऐसे व्यक्ति अपने रखे धन सम्पति को विलासिता में लिप्त होकर बरबाद कर देते हैं।
३> ललाट पर दाँए भंव के ऊपर तिल होना भी विलासिता को दर्शाता है परन्तु ऐसे व्यक्ति स्वयं धन अर्जित कर के उसे बरबाद कर देते हैं।
कान अथवा कर्ण:
१> बाएँ कान के सामने की तरफ़ कहीं भी तिल का होना व्यक्ति के रहस्यमयी होने के गुण को दर्शाता है। साथ ही साथ ऐसे व्यक्ति का विवाह अधिक उम्र होने के पश्चात् होता है।
२> बाएँ कान के पीछे की तरफ़ तिल का होना व्यक्ति के ग़लत कार्यो के प्रति झुकाव को दर्शाता है।
३> दाँए कान के सामने की तरफ़ कही भी तिल हो तो वह व्यक्ति बहुत कम आयु में ही धनवान हो जाता है। साथ ही साथ व्यक्ति का जीवन साथी सुंदर होता है।
४> दाँए कान के पीछे अगर तिल है तो यह तिल कान में किसी भी प्रकार के रोग होने की सम्भावना व्यक्त करता है।
आँख,नेत्र अथवा नयन:
१> बाएँ आँख के भीतर सफ़ेद भाग में तिल का होना चरित्र हीनता का सूचक है।
२> बाएँ आँख के पुतली पर तिल का होना भी चरित्र हीनता का सूचक है परन्तु इसका प्रभाव भीतर के तिल से कम होता है।
३> बाएँ आँख की नीचे की पलकों पर तिल होना व्यक्ति के आलसीपन और विलासी चरित्र को दर्शाता है। ४> दाँए आँख के भीतर सफ़ेद भाग में अगर तिल हो तो वह व्यक्ति भी चरित्रहीन होता है अथवा ऐसे व्यक्ति के जीवन का अंत या तो हत्या से होता है या फ़िर वह आत्मदाह कर लेता है
५> दाँए आँख के ऊपर का तिल आँखों से सम्बंधित रोग का सूचक है। एवं ऐसे व्यक्ति अविश्वासी होते हैं। ना यह किसी पर विश्वास करते है और न ही विश्वास के पात्र होते हैं।
६> दाँए आँख के नीचे की पलकों पर तिल का होना उस व्यक्ति के कम आयु से ही विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण का सूचक है।
नाक:
१> नाक के अग्र भाग पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति लक्ष्य बना कर चलने वाले होते हैं तथा किसी भी कार्य को उस समय तक नही करते जब तक की वह उस कार्य के लिए स्वयं को पूर्ण सुरक्षित महसूस न कर लें। साथ ही साथ यह व्यक्ति भी विपरीत लिंग के प्रति बहुत आकर्षित होता है।
२> इसके अलावा अगर नाक पर कहीं भी तिल हो तो व्यक्ति को नाक सम्बंधित कोई भी रोग हो सकता है।
३> नाक के नीचे (मूछ वाली जगह ) पर दाँए अथवा बाएँ अगर कहीं भी तिल हो वह व्यक्ति भी अधिक विलासी होगा तथा नींद बहुत अधिक पसंद करेगा।
होंठ:
१> उपरी होंठ के बाएँ तरफ़ तिल होना जीवनसाथी के साथ लगातार विवाद होने का सूचक है।
२> उपरी होंठ के दाँए तरफ़ तिल हो तो जीवनसाथी का पूर्ण साथ मिलता है।
३> निचले होंठ के बाएँ तरफ़ तिल होना किसी विशेष रोग के होने का सूचक होता है एवं ऐसे व्यक्ति अच्छे भोजन खाने तथा नए वस्त्र पहनने के शौकीन होते हैं।
४> निचले होंठ के दाँए तरफ़ तिल हो तो वह व्यक्ति अपने क्षेत्र में बहुत प्रसिद्दि प्राप्त करते हैं। साथ ही साथ इन्हे भोजन से कोई खास लगाव नही होता है। लेकिन विपरीत लिंग इन्हे अधिक आकर्षित करते हैं।
गाल:
१> जिस व्यक्ति के बाएँ गाल,नाक तथा ठुड्डी पर तीनो जगह तिल हो तो ऐसे व्यक्ति के पास स्थायी धन हमेशा रहता है। परन्तु अगर सिर्फ़ कही एक जगह ही तिल हो तो उसे पैसे का आभाव नही होता।
२> इसी प्रकार दाँए गाल,नाक तथा ठुड्डी पर तीनो जगह तिल हो तो ऐसे व्यक्ति भी धनवान होते हैं परन्तु घमंडी भी होते हैं। एसऐ व्यक्ति अपना धन किसी भी सामाजिक कार्य में नही लगते हैं। परन्तु अगर सिर्फ़ कही एक जगह ही तिल हो तो उसे पैसे का आभाव नही होता।
३> दाँए गाल पर तिल होना व्यक्ति के घमंडी होने का सूचक है।
कंठ,गला तथा गर्दन:
१> कंठ पर तिल का होना सुरीली आवाज़ का सूचक है तथा ऐसा व्यक्ति संगीत में रूचि रखता है।
२> गले पर और कहीं भी तिल होने वाले व्यक्ति संगीत के शौखिन होते हैं परन्तु उन्हे गले सम्बंधित रोग एवं कुछ व्यक्तियों में दमा जैसे रोग भी पाए गए हैं।
३> अगर गले के नीचे तिल हो तो ऐसा व्यक्ति गायक होता है। एवं उसकी आवाज़ बहुत सुरीली होती है। ४> गले के पीछे अगर तिल हो तो रीढ़ सम्बंधित रोग होते हैं।
सीना अथवा छाती:
1> बाएँ तरफ़ सीने में तिल का होना सीने या ह्रदय रोग की शिकायत होने एवं मध्यस्तर के जीवनसाथी का मिलना तथा अधिक उम्र में शादी होने की स्थिति को दर्शाता है। वक्ष स्थल पर यदि तिल हो तो वह व्यक्ति अधिक कामुक होता है और अनेको प्रकार की बदनामी को झेलता है।
२> दाँए तरफ़ सीने में तिल का होने से सुंदर जीवनसाथी मिलता है एवं यह व्यक्ति धनवान भी होता है। परन्तु यदि तिल वक्ष स्थल पर है तो इसका प्रभाव भी बाएँ तिल के सामान होता है।
उदर अथवा पेट:
१> उदर के बाएँ तरफ़ तिल होना पेट सम्बन्धी रोगों का सूचक है एवं अधिकतम लोगो में पाया गया है की उन्हे शल्य चिकित्सा भी करनी पड़ी है। ऐसे लोग भोजन अधिक नही कर पाते है।
२> उदर के दाँए तरफ़ तिल होना व्यक्ति के भोजन के प्रति अधिक लगाव को दर्शाता है। साथ ही साथ यह आरामदेह व्यक्ति होते हैं।
३> नाडी के बीचोबीच तिल का होना नाडी सम्बंधित रोगों तथा लकवे की बीमारी के होने का सूचक है।
४> नाडी के नीचे तिल यदि हो तो वह व्यक्ति कम आयु में ही मैथुन क्रिया में कमजोर हो जाता है एवं अप्पेंधिक्स और होर्निया जैसे रोगों से पीड़ित होने की संभावना अधिक रहती है।
गुप्तांग:
१> पुरूष के गुप्तांग पर यदि तिल हो तो वह पुरूष अधिक कामुक एवं एक से अधिक स्त्रियों के संपर्क में रहता है।साथ ही साथ उस व्यक्ति हो पुत्र प्राप्ति की सम्भावना अधिक होती है एवं ४५-५० के बीच की आयु में उसे शिथिल इन्द्रियों का रोग हो जाता है।
२> स्त्री के गुप्तांग पर यदि बाएँ तरफ़ तिल है तो वह स्त्री अधिक कामुक, कम आयु से ही विपरीत लिंग के संपर्क में अधिक रहना अथवा इन्द्रियों सम्बंधित रोगों से पीड़ित होती हैं।ऐसी स्त्रियाँ कन्या को अधिक जनम देती हैं।यदि तिल दाँए तरफ़ है तो यह भी अधिक कामुक होती है तथा गुप्तांग में किसी प्रकार की फंगल रोग से पीड़ित हो जाती हैं। परन्तु ऐसी स्त्रियाँ कन्या से अधिक पुत्र को जनम देती हैं। तिल के अग्र्र भाग में नीचे होने पर वह स्त्री भी कामुक होती है पर वह कम आयु में ही विधवा हो जाती है।
हाथ, उंगलियाँ अथवा भुजा:
१> हाथ के पंजे में अगर किसी भी ग्रह के स्थान पर यदि तिल है तो वह उसे ग्रह को कमजोर करता है तथा हानि ही करता है। तिल हाथपर अन्दर की तरफ हो या फ़िर बहार की तरफ़ प्रभाव यही रहता है। कुछ लोगों को यह भ्रान्ति है की हाथ के पंजे का तिल शुभ होता है। परन्तु ऐसा नही होता।
२> तर्जनी ऊँगली (पहली ऊँगली ) पर कहीं भी तिल हों तो ऐसा व्यक्ति कितना भी धन कमाए उसके पास पैसा कभी नही टिकता। ऐसे व्यक्ति को आँखों में कमजोरी की शिकायत रहती है तथा कम आत्मविश्वाशी होता है।
तर्जनी ऊँगली के नीचे बृहस्पत का पर्वत होता है इसलिए अगर उस पर्वत पर तिल है तो वह व्यक्ति अपने पूर्वजो के रखे हुए धन को भी गवा देता है तथा अंत समय में दरिद्र होके रहता है।
३> मध्यमा ऊँगली में कही भी तिल है तो यह व्यक्ति अनेको बार दुर्घटना का शिकार होता है, एवं पुलिस, थाना अथवा कचहरी का आना जाना लगा रहता है। ऐसे व्यक्ति को जीवन भर हर कार्य के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है साथ ही साथ कोई भी काम में स्थिर नही रह पता है। मध्यमा उंगली के नीचे शनि का पर्वत होता है। शनि पर यदि तिल है तो इस व्यक्ति की आकाल मृत्यु अवश्य निश्चित हैअन्यथा उसे आजीवन कारावास झेलना निश्चित है।
४> अनामिका ऊँगली में कही भी तिल होंतो ऐसे व्यक्ति का पढ़ाई में मन कम लगता है तथा उसकी प्रतिभा धूमिल होती है। ऐसे व्यक्ति ह्रदय सम्बन्धी रोग का शिकार होते हैं। अनामिका ऊँगली के नीचे सूर्य का पर्वत होता है। अगर इस पर्वत पर तिल है तो यह व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी कार्य में सफल नही होता है। साथ ही साथ बदनामी भी झेलनी पड़ती है और मृत्यु ह्रदय रोग से होती है।
५> कानी अथवा कनिष्क ऊँगली पर यदि तिल हों तो ऐसे व्यक्ति का अपने जीवनसाथी के साथ हमेशा विवाद होता रहता है, साथ ही उसे चर्म रोग ( सफ़ेद दाग ) की शिकायत रहती है। कानी ऊँगली के नीचे बुद्ध का पर्वत होता है.यदि तिल इस पर्वत पर है तो ऐसे व्यक्ति की शल्य चिकित्सा जरुर होती है। ऐसे स्त्रियों के बच्चे भी शल्य चिकत्सा के बाद होते है।
६> अंगूठे पर तिल होने पर उस व्यक्ति को यश नही मिलता। अंगूठे के नीचे शुक्र का पर्वत होता है। यदि शुक्र पर्वत पर तिल है तो ऐसे व्यक्ति को गुप्त रोगों की शिकायत रहती है।ऐसे लोगों को पुत्र कष्ट होता है।
७> यदि जीवनरेखा पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति की कम आयु में ही किसी विशेष रोग से मृत्यु होती है। शुक्र और बृहस्पत पर्वत के बीच में मंगल का स्थान होता है, इस स्थान पर यदि तिल हो तो उस व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की सम्भावना रहती है। यदि दिमाग रेखा पर तिल हो ऐसे व्यक्ति भी मस्तक सम्बन्धी रोग से पीड़ित होते है साथ ही साथ नौकरी में अनेको प्रकार की बाधाएं होती हैं। ह्रदय रेखा पर यदि तिल हो तो ह्रदय सम्बन्धी रोगों के कारन कम आयु में ही मृत्यु होती है। चन्द्र रेखा पर तिल होने पर ऐसे व्यक्ति मानसिक रोग से पीड़ित होते है एवं इनके शरीर पर तापमान का अधिक प्रभाव होता है। राहू ग्रह के पर्वत पर तिल होने पर ऐसे व्यक्ति किसी भी व्यवसाय में सफल नही होते और आजीवन उदर रोग से परेशान रहते हैं। केतु ग्रह पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति पर चरित्रहीनता का आरोप लगता रहता है तथा जोडो में आजीवन दर्द रहता है।
८ > मणिबंध ( कलाई ) पर अगर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति को यश नही मिलता है। ऐसे व्यक्ति को पुत्र कष्ट भी होता है।
यदि यही सारे तिल हाथ, उँगलियों पर ऊपर की तरफ़ हो तो सारे वही प्रभाव रहते है परन्तु उनका असर ५० प्रतिषत कम हो जाता है। यदि तिल दाँए हाथ में है तो किसी पूजा या अनुष्ठान से उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है परन्तु यदि वही तिल बाएँ हाथ में है तो उसका प्रभाव कम नही हो सकता और व्यक्ति को उस तिल के प्रभाव झेलने ही पड़ते हैं।
९>बाएँ भुजा ( कोहनी से नीचे ) यदि कही भी तिल है तो उस व्यक्ति की पढ़ाई में बाधा उत्पन होती है एवं कई लोगों में ऐसा भी पाया गया है की उनका मन पढ़ाई से भाग जाता है। कोहनी से ऊपर अगर कही भी तिल है तो यह व्यक्ति
शारीरिक रूप से कमजोर होता है।
१०> दाँए भुजा (कोहनि से नीचे ) यदि कही भी तिल है तो यह व्यक्ति अपने कलम की कमाई खाते है यानि अपना जीवन यापन स्वयम करते हैं। यदि कोहनी से ऊपर की तरफ़ कही भी तिल है तो यह व्यक्ति बहुत साहसी होता है।
११> यदि कोहनी पर तिल है तो उस व्यक्ति को हमेशा जोडो के दर्द की तकलीफ रहेगी। बाएँ हाथ के तिल का असर कभी ख़त्म नही हो सकता है। यदि दाँए हाथ की कोहनी पर तिल है तो पूजा या उपचार करने से कष्ट दूर हो सकता है।
पैर:
१> यदि पैर पर भी हाथ की तरह उन्ही जगह पर तिल है तो सारे प्रभाव हाथ जैसे ही होते है। परन्तु माना गया है की हाथ के तिल का प्रभाव पैर के तिल से ज्यादा होता है।
२> बाएँ पैर की जांघ पर यदि तिल हो तो यह व्यक्ति भोगी होता है। एवं कुछ लोगों में बवासीर होने की शिकायत भी पाई गई है। दाँए पैर की जांघ पर यदि तिल हो तो ऐसे व्यक्ति भी भोगी विलासी होते है। ऐसे व्यक्तियों को विपरीत लिंग के प्रति अधिक आकर्षण रहता है।
३> यदि घुटने पर तिल हो तो जोडो के दर्द अथवा मूत्र सम्बन्धी रोग हो सकते हैं।
पीठ:
पीठ के रीढ़ के दाए हिस्से पर उपर की तरफ़ यदि तिल हो तो यह व्यक्ति धनवान होता है एवम अपनो द्वारा अनेको बार मुसीबत आने पर मदद पता है.दाए ओर कमर से उपर यदि तिल हो तो ऐसा व्यक्ति खाने पीने का शौखिन होता है। तथा पेट के रोगों से ग्रस्त रह सकता है।यदि तिल कमर पर दाईं तरफ़ हो तो यह व्यक्ति अधिक कामुक होता है.बाएँ तरफ़ ऊपर की तरफ़ यदि तिल हो तो यह व्यक्ति बहुत कठिन परिश्रम के बाद ही पैसा कमाता है एवं अपने लोग इसे धोखा दिया करते हैं। यदि नीचे बैएँ तरफ़ तिल हो तो यह व्यक्ति आजीवन उदर रोग से ग्रस्त रहता है। तथा शल्य चिकित्सा की सम्भावना अधिक होती है। यदि तिल कमर पर हो तो यह व्यक्ति आजीवन कमर के दर्द से परेशान रहता है। तथा यदि स्त्री है तो उसे श्वेत प्रदर का रोग हो सकता है और पुरूष हो तो स्वप्नदोष की बेमारी अधिक होती है। रीढ़ पर ऊपर से नीचे यदि कहीं भी तिल हो तो रीढ़ की बीमारी या शरीर में जोडो के दर्द की शिकायत होती है। तथा ऐसे लोग हमेशा अपनों से ही धोखा खाते हैं और इनके पीठ पीछे हमेशा वार होता है। अधिकतर पाया गया है ऐसे लोग अपनों से ही धोखा खाते हैं।
हाथ के कांख:
दाँए कांख में यदि तिल हो तो यह व्यक्ति बहुत धनवान होता है तथा कंजूस भी होता है। बाएँ कांख में तिल हो तो यह व्यक्ति पैसे तो कमाते हैं लेकिन रोग और भोग में ही पैसो का नाश हो जाता है।
हिप:
यदि बाएँ हिप पर तिल हो तो यह व्यक्ति बवासीर सम्बन्धी या भगंदर सम्बन्धी रोगों से पीड़ित हो सकता है। यदि दाँए हिप पर तिल हो तो यह व्यक्ति व्यापारी है तो अपने व्यापर में बहुत आगे बढ़ता है
Saturday, 21 March 2009
मीडिया की नज़रों में: काली मन्दिर और मेरा ट्रस्ट....
Friday, 2 January 2009
सेवक संजयनाथ काली न्यास की स्थापना - 1993

मंदिर की स्थापना के बाद मुझे यह एहसास हुआ की मेरे जीवन के पश्चात कही यह मंदिर ओर भूमि परिवारवाद के अधिपत्या मैं ना पड़ जाए. इस सोच के कारण मैने 5 फ़रवरी 1993 में सेवक संजयनाथ कालीन्यास नामक एक चारिटबल ट्रस्ट की स्थापना की. इस ट्रस्ट का मुख्य उदेश्य माँ काली का मंदिर, स्कूल,कॉलेज हॉस्पिटल,धर्मशाला,वृधया आश्रम, अनाथ आश्रम जैसे सामाजिक क्रायो को प्रोत्साहित करना है।
इस ट्रस्ट को सुराक्षित करने हेतु मैने 10 नियम रिजिस्टर करवाए।
1. इस ट्रस्ट का पीठाधीश आजीवन अविवाहित सन्यासी होगा और माँ काली का भक्त होना चाहिए. पीठाधीश ही इस ट्रस्ट के स्थाई ट्रस्टी होंगे
२ पीठाधीश ही अपने उत्तराधिकारी पीठाधीश का चयन करेंगे. किसी कारणवश अगर पीठाधीश किसी का चयन नही कर पाए तो ट्रस्ट के स्थाई सदस्य ही उत्तराधिकारी का चयन करेंगे।
3. पीठाधीश अगर किसी कारणवश विवाह कर लेते हैं तब स्वतः ही वह इस पद से मुक्त समझे जाएँगे ओर नये पीठाधीश का चुनाव स्थाई सदस्य के द्वारा होगा
4. इस ट्रस्ट में दो प्रकार के सदस्य होंगे. स्थाई ओर अस्थाई सदस्य
5. इस ट्रस्ट में सिर्फ़ 2 स्थाई सदस्य होंगे. एक पीठाधीश ओर दूसरा डॉक्टर विन्दा प्रसाद वर्मा के परिवार के कोई एक सदस्य होने चाहिए
6. इस ट्रस्ट की एक स्थाई कार्यकारिणी कमिटी होगी जिसमें एक अध्यक्ष, एक सचिव, एक कोषाध्यक्ष और अन्य सदस्य होंगे जिनका चुनाव हर दो वर्ष पर होगा . बीच में किसी प्रकार अस्थाई समिति के द्वारा किसी प्रकार की त्रुटि पाए जाने पर पीठाधीश और स्थाई सदस्यों के द्वारा कभी भी इस कमिटी को भंग किया जा सकता है और नये कमिटी का गठन किया जा सकता है।
7। इस ट्रस्ट की पूरी व्यवस्था और विकास की ज़िम्मेदारी अकेले पीठाधीश की होगी
8. इस ट्रस्ट के मंदिर और बाकी सामाजिक संस्थान से आने वाली पूरी आमदनी को ट्रस्ट के नाम पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया रक्सौल या फिर किसी दूसरे बैंक में ट्रस्ट के नाम पर जमा कराया जाएगा. इस अकाउंट को पीठाधीश एवं सेक्रेटरी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जाएगा।
9। इस ट्रस्ट की संपति को कोई भी किसी भी स्थिति में बेच और ट्रान्स्फर नही कर सकता. पीठाधीश को भी यह अधिकार नही होगा।
10. पीठाधीश को ट्रस्ट की अधिक संपति को किसी भी सरकारी या सामाजिक संस्थान में प्रयोग करने का अधिकार होगा. इस ट्रस्ट के सभी बहिखते एवं विपत्र पीठाधीश के अधीन होंगे
११ इस ट्रस्ट कमिटी और ट्रस्ट के ऑफीस के सभी निर्णय जॉइंट कमिटी पास करेगी.
Monday, 17 November 2008
वामपीठ की स्थापना- सेवकसंजयनाथतांत्रिककालीमन्दिर के रूप में...
साधना करने के साथ साथ १९९० से मैंने मन्दिर निर्मांड का कार्य भी ज़ोर शोर से शुरू कर दिया। उस दौरान मेरी उम्र बोहत कम थी और मेरे भक्तो की भी संख्या कम थी। मेरा सपना था की मैं बिहार राज्य मैं सबसे ऊँचा मन्दिर बन्वओं जिसके हर खंड में अनेकों देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित हो। इस सोच को मन में लिए मैं माँ की आराधना करता रहा। माँ की कृपा मेरे ऊपर सदा बनी रही और मेरे भक्तो ने मुझे मन्दिर बनाने में अपने समार्थ अनुरूप सहयोग दिया। मुझे फ़िर भी लगा की अभी कुछ और करना है इसलिए मैंने टी.म.ठ्कर की दावा कंपनी में काम करना शुरू किया। वहा काम करने से जितना पैसा एकत्रित हुआ वह सब मैंने मन्दिर के भू तल निर्मांड में लगा दिया। उस समय मैं अपने माता पिता के साथ रहता था इसलिए मेरा अपना खर्च भी कुछ नही था।
मेरी इक्षा थी की शिवरात्रि तक मैं अपने साधना ग्रह में माँ काली और गुरु भगवान् शिव की स्थापना कर दूँ।
पर मूर्ती खरीदने के लिए पैसों की कमी थी। इस बार फ़िर माँ ने अपनी कृपा दिखायी और उनकी कृपा से एक दिन स्वयं मेरे प्रथम शिष्य किरण शंकर सर्राफ जी ने अपनी ओर से मन्दिर की प्रतिमा दान देने की अपनी इक्षा मुझसे व्यक्त की। साथ ही मेरे एक और शिष्य श्री नन्द जी बरनवाल ने शिव लिंग की प्रतिमा दान करने का निश्चय किया। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा और मैं नन्द जी और राज किशोर जी को साथ ले के शीघ्र ही बनारस जा पहुँचा। वहा के जयपुर मूर्ती भण्डार में मैंने माँ की अनेकों प्रतिमाएं देखीं। एक प्रतिमा ने मुझे बोहत आकर्षित किया। उसका मूल्य ३५००० रुपए था। किरण जी से मुझे २५००० रुपए मिले थे और मेरे पास ख़ुद के पैसे मिला कर सिर्फ़ ३१००० रुपए बन पा रहे थे। दूकानदार संजय गौर से मैंने बोहत कहा की वोह मुझे प्रतिमा ३१००० में दे दे। परन्तु वोह नही माना। मैंने हठ कर लिया था की जब तक वो प्रतिमा नही लूँगा तब तक अन्न जल ग्रहण नही करूँगा। दूकानदार और उसके पिताजी दोनों ही इतने कम दाम मैंने मूर्ति देने को तैयार नही थे। शाम तक बिना कुछ ग्रहण किए वही बैठा रहा। अंत में मेरी आँखों से आंसू गिरने लगे। तब दुकानदार के पिताजी को मेरे हठ का पता चला। और वो प्रतिमा ३१००० में देने को राजी हो गए। मैंने उन्हे आशीर्वाद दिया की यह ५००० हज़ार का मूल्य उन्हे लाखों में माँ से वापस मिलेगा। फ़िर मैं माँ की मूर्ति और शिव लिंग ले के वहां से निकला। आज वही जयपुर मूर्ति भण्डार अरबो की कमाई कर रहा है और वहां के दूकानदार मेरे भक्त बन गए हैं और बिना पैसे के भी वो आज मूर्ति देने के लिए व्याकुल रहते हैं।
अब मेरे पास सिर्फ़ १५०० रुपए बचे थे और रक्सौल मूर्ति के जाने के लिए जीप का दाम ३००० से ज्यादा था। मैं सोच ही रहा था की मूर्ति को सुरक्षित कैसे ले जाओं। तभी कही से एक भांग पिया हुआ ड्राईवर एक जीप में स्वयं आया और उसने अपने मालिक से पुछा की कहीं सामन ले जाना है? मालिक ने उसे हमारे बारे में बताया की रक्सौल जाना है। आश्चर्य की बात यह थी की उसने स्वयं ही १५०० रुपए मांगे जितने की मेरे पास थे। तब हम मूर्ति ले के रक्सौल के लिए रवाना हो गए। उस ड्राईवर को मैंने शिव का साक्षात् रूप माना। और रक्सौल जाके उसे अपनी तरफ़ से २५१ रुपए दिए और अपने घर खाना भी खिलाया। वह भी बोहत खुश होके वापस गया।
इस प्रकार १९ फरवरी १९९३ को माँ काली और शिव लिंग की तांत्रिक पद्दति से मेरे साधना ग्रह में मेरे द्वारा स्थापना पूर्ण हुई।
अब मेरे पास सिर्फ़ १५०० रुपए बचे थे और रक्सौल मूर्ति के जाने के लिए जीप का दाम ३००० से ज्यादा था। मैं सोच ही रहा था की मूर्ति को सुरक्षित कैसे ले जाओं। तभी कही से एक भांग पिया हुआ ड्राईवर एक जीप में स्वयं आया और उसने अपने मालिक से पुछा की कहीं सामन ले जाना है? मालिक ने उसे हमारे बारे में बताया की रक्सौल जाना है। आश्चर्य की बात यह थी की उसने स्वयं ही १५०० रुपए मांगे जितने की मेरे पास थे। तब हम मूर्ति ले के रक्सौल के लिए रवाना हो गए। उस ड्राईवर को मैंने शिव का साक्षात् रूप माना। और रक्सौल जाके उसे अपनी तरफ़ से २५१ रुपए दिए और अपने घर खाना भी खिलाया। वह भी बोहत खुश होके वापस गया।
इस प्रकार १९ फरवरी १९९३ को माँ काली और शिव लिंग की तांत्रिक पद्दति से मेरे साधना ग्रह में मेरे द्वारा स्थापना पूर्ण हुई।
उस दिन मैंने माँ से पहली बार एक प्राथना की। मैंने उनसे कहा की "हे माँ हर साल आप एक खंड बनवा देना इस से अधिक मैं कुछ नही मांगता। " और यह भी एक सत्य है की आज तक हर साल माँ की कृपा से मैं कुछ न कुछ बनवा ही रहा हूँ... १९९९ में इस मन्दिर के सात खंड पूरे हुए।
Thursday, 6 November 2008
मेरी कामरूप कामख्या यात्रा...

१९९४ में आमुबाची पर्व पर कामख्या में मैंने १६ दिन की अपनी साधना को पूर्ण किया।
इसमें मुख्यतः भैरवी चक्र साधना, योनी पूजा और भैरव चक्र जैसी साधनायें थीं। बिना इन साधना के कोई भी व्यक्ति वाम मार्गी नही हो सकता। यह वाम मार्ग के सबसे कठिन साधनायें हैं। इन साधनाओं की क्रिया को सार्वजनिक करना उचित नही होता। इसलिए यह गुरु शिष्य परम्परा से प्राप्त होता है। यह सभी अति गोपनीय साधना हैं। इसलिए इस क्रिया को यहाँ प्रकाशित नही कर रहा हूँ।
भैरवी चक्र साधना:
इस साधना को ७ दिनों में पूरा किया जाता है। इस साधना में सबसे कम उम्र के भैरव को शिव स्वरुप मान के शिव की आसन पे बिठाया जाता है और सब से कम उम्र की भैरवी को माँ काली का स्वरुप मान कर काली के आसन पर बिठाया जाता है। यह क्रिया रात्रि १० बजे के बाद शुरू की जाती है। इसमें सभी भैरव और भैरवी दिगंबर रूप से साधना करते हैं। इस साधना के पुरोहित को कौलाचार्य कहते है और उनके आदेश को शिव का आदेश समझ कर यह साधना की जाती है। वहा अगर वो धर्म विरुद्ध बात भी कहें तो उसे वेदतुल्य समझा जाता है।
तत्पश्चात कौलाचार्य उस भैरव और भैरवी की पूजा शुरू करते हैं जिसे शिव और काली के रूप में स्थापित किया जाता है। भाग्यवश कम उम्र होने के कारन इस पूजा में उस शिव रूप का स्थान मुझे ही मिला था एवं भैरवी रूप में शिवानी नामक एक बंगाली साध्वी को माँ काली का रूप मिला था।
७ दिनों तक यह क्रिया रात्री १० बजे से सुबह ३ बजे तक की जाती थी। इस क्रिया को बोहत सारे भैरव, भैरवी पूरा करने में विफल रहे। पर माँ की कृपा से मैंने इसे दूसरी बार में ही पूरा कर लिया। इस साधना में अघोर भैरव और भैरवी मंत्र का प्रयोग किया जाता है जो की किसी गुरु की सहायता से ही करना चाहिए अन्यथा अनर्थ भी हो सकता है।
भैरव चक्र साधना:
यह साधना ३ दिन में पूरा किया जाता है। इस साधना को उस शमशान में पूरा किया जाता है जहा पर कम से कम नित्य एक शव जलता रहता हो। कामख्या और ब्रम्हपुत्र नदी के समीप एक शमशान में अष्टमी की रात को यह साधना सभी भैरवो ने शुरू की। इस साधना में भैरवी का प्रवेश निषेध होता है। यह साधना रात्री १२ बजे के बाद शुरू की जाती है और ब्रम्ह मुहूर्त तक चलती है। इस साधना में प्रथम दिन स्नान करने के बाद पूरे शरीर में भभूत लगा कर ३ दिनों तक शम्शाम में ही शिव के अघोर रूप में वास किया जाता है। इसमें प्रथम दिन भैरव के आकर्षण मंत्र मौरंग दौरंग मंत्र का जाप किया जाता है. दुसरे दिन झांग झांग झांग हांग हांग हांग हेंग हेंग महामंत्र से सभी क्रियाएँ की जाती हैं। फ़िर तीसरे दिन शमशान भैरव के महा मंत्र से साधना करने के बाद इस भैरव साधना का विसर्जन किया जाता है। भैरव साधना के बिना कोई भी वाम मार्गी पुरूष साधक नही हो सकता। जो साधक इस साधना को सफलता से पूरा कर लेता है उसके इक्षा मात्र से भक्तो के कष्ट दूर हो जाते हैं। अतः इसकी तांत्रिक साधना में बहुत महत्व है अतः आम लोगो से गुप्त रखा जाता है।
कामख्या योनी पूजा:
यह क्रिया १ दिवसीय होती है। इस पूजा में भैरव और भैरवी का होना अति आवश्यक होता है। तंत्र में योनी को ही श्रृष्टि का मुख्या द्वार बताया गया है। इसलिए जो उत्तम साधक होते हैं वह अपने किसी तांत्रिक साधना को करने से पहले योनी साधना अवश्य करते हैं। जो योनी का आदर नही करते उनपर माँ कभी प्रसन्न नही होती। इस पूजा की विधि को जान ने के लिए किसी वामाचार्य के पास जाना पड़ता है।यह भी गुप्त क्रिया है.
Saturday, 4 October 2008
तारा पीठ साधना--तंत्र साधना की तरफ़ एक कदम और...

१९९० में दुर्गा पूजा के समय मैंने स्वयं तारा पीठ जा कर अपने २ शिष्यों के साथ फ़िर से शव साधना की। शमशान पहुच कर एक अघोरी बाबा से मैंने पुछा की चरण पादुका तो मैंने देखा नही है। मुझे शव साधना करनी है तुम मुझे वह तक पहोचा दो। वह मुझे चरण पादुका तक ले गए। वहा पहले से ही एक साधक साधना कर रहा था। तब में बोहत दुखी हुआ मुझे लगा की मैं तो अब साधना नही कर पाउँगा
मुझे उदास देख कर उस अघोरी ने कहा की बाबा अगर आप चाहो तो एक जगह और है जहा की आप साधना कर सकते हो। मैंने उनसे उस जगह के विषय मैं जानकारी ली।
उस जगह कभी तारा पीठ के प्रथम साधक वामाखेपा ने अपनी साधना की थी। मैं बोहत प्रस्सन हुआ की मुझे उस जगह साधना करने का अवसर प्राप्त हुआ. लेकिन फ़िर उस अघोरी ने मुझे बताया की इस स्थल पर आज तक जितने भी साधक साधना करने आए वे या तो पागल हो गए या फ़िर मृत्यु को प्राप्त हो गए।
यह सुन कर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। मैं चाहता था की मैं कुछ अलग और कठिन साधना करूँ। इसलिए मैंने संकल्प किया की अब तो मैं वही साधना करूँगा.
मैं वहा गया और रात में शव साधना प्रारम्भ कर दिया। इस बार भी पहले के जैसे चमत्कार हुए और शमशान में साधना करने वाले सभी अघोरी यह देखने लगे की एक २४ साल का युवा कितनी कठिन साधना कर रहा है।
उस रात पहली बार मैंने स्वतंत्र रूप से स्वयं साधना की थी। मेरी इस साधना से पूरा शमशान जाग उठा था, जो की अपने आप में ही एक अद्वित्य घटना थी।
रात भर मैंने कई गोपनीय क्रियाएं की और अंत में मैंने अपनी साधना प्रातः काल ५ बजे संपूर्ण की। वामाखेपा की साधना के बाद सिर्फ़ मैंने ही वहां पर यह साधना पूर्ण की थी। इस से मेरा मनोबल और बढ़ गया और तंत्र साधना के प्रति मेरा विश्वास और गहरा हो गया।
सुबह माँ तारा के दर्शन के बाद हम फ़िर से उस शमशान को देखने आए। फ़िर से उस अघोरी से मैंने बात की। सारे अघोरी मुझसे शिक्षा प्रतप्त करने के लिए विनीति करने लगे। तब मैंने उन्हे समझाया की मैंने तुंरत ही साधना सिद्धि में कदम रखा है. मैंने उनसे वशिष्ठ मुनि की चरम पादुका के पास ले जाने का अनुरोध किया। उस अघोरी बाबाके साथ मैं वहां पोहांचा।
चरण पादुका पे मैंने देखा की तीन कुवारी कन्याएं पूजा कर रही थी। मैं बहार ही रुक गया और उनकी पूजा समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगा। वह तीनो मन्दिर के बाहर आ कर खड़ी हो गयीं। मैंने अपने शिष्यों को चरण पादुका के दर्शन के लिए भेजा। मैंने देखा की वोह तीन कन्याएं वही खड़ी थी। अंत में मैं भी पूजा करने के लिए चरण पादुका के पास गया। पूजा के बाद उन तीनो कन्याओं ने मुझे आवाज़ दे कर रोका और अपने हाथ से मुझे चंदन लगाया।
मैंने उनसे उनका परिचय पुछा तब उन्होंने कहा की वह पटना के पुनैचोव्क नमाक स्ताहन पर रहती हैं। मैंने उनसे उनका पता ले लिया और फ़िर वह वह से चली गयीं।
मैं भी वापस माँ तारा मन्दिर के बहार कुछ किताबें देखने लगा । वही मुझे वमखेपा की जीवनी नज़र आई। मैंने उसे ख़रीदा और पढने लगा। पढने के क्रम में मैंने यह जाना की वशिष्ठ पादुका के बाहर स्वयं वमखेपा को भी तीन कुवारी कन्याओं के रूप में स्वयं माँ ने दर्शन दिए थे और उन्हे भी चंदन का तिलक लगाया था।
यह पढ़ते ही मैं व्याकुल हो उठा और उन तीनो कन्याओं को खोजने लगा। लेकिन फ़िर भी वोह तीनो मुझे कही दिखाई नही दी।
मुझे बोहुत ग्लानी हुई की काश मैंने जीवनी पहले पढ़ी होती तो मैं माँ का चरण पकड़ लेता जब उन्होंने मुझे दर्शन दिया।
उसके बाद हम लोग कलकत्ता के लिए रवाना हो गए। कलकत्ता पोहचने के बाद एक मारवाडी धर्मशाला मैं रुके और भूतनाथ के दर्शन किए।
फ़िर रात में भूतनाथ शमशान में भैरव साधना शुरू किया। उसके बाद दाख्शिनेश्वर मन्दिर में माँ काली के दर्शन करने के बाद वापस रक्सौल के लिए प्रस्थान किया.
Friday, 3 October 2008
माँ काली के मन्दिर के निर्माण की शुरुआत...

शव साधना के तुंरत बाद माँ काली ने स्वयं मुझे एक दिन स्वप्न में कहा की जा मेरी एक मन्दिर की स्थापना रक्सौल में कर।
इस स्वप्न के बाद में सोच में पड़ गया की यह कैसे सम्भव है? ना तो मेरे पास पैसा था न ही जमीन। मैं सोच ही रहा था की मेरे घर के सामने रहने वाले सलेस टैक्स ऑफिसर "गोपाल प्रासाद जैसवाल" से जाके मैंने इस बारे मैं बात की।उन्होंने कहा की जमीन जब मिले तब मिले आप एक माँ काली की प्रतिमा पहले बना कर पंडाल मैं उसकी पूजा शुरू करें। मैं इस बात से खुश हुआ।
शिवरात्रि आने वाली थी इसलिए मैंने तय किया की इस शिवरात्रि मैं माँ काली की मिटटी की मूर्ति बना कर पूजा करूँगा और इस काम मैं लग गया.गोपाल प्रसाद जैसवाल ने माँ की प्रतिमा अपनी तरफ़ से भेंट की। और साथियों की सहायता से मैंने विधिपूर्वक माँ की पूजा शिवरात्रि के दिन पूर्ण की। इस पूजा से पहले रक्सौल में कही भी काली की पूजा नही हुई थी और कोई काली मन्दिर की स्थापना भी नही हुई थी. लोग माँ काली से डरते थे और मुझे भी डराने की कोशिश की। परन्तु मैं निष्ठां पूर्वक साधना करता रहा। इस पूजा के विसर्जन के ५-७ दिन बाद ही रक्सौल के नगर सेठ "जय किशन राम" ने मुझे अपने घर बुलवाया और मुझसे कहा की मैंने सुना है की तू माँ की पूजा करता है , मेरी पत्नी बोहत बीमार है, क्या तुम कुछ कर सकते हो?
मैंने सोचा की अगर मैं इनकी कुछ मदद कर सका तो शायद यह माँ के मन्दिर बनने मैं मुझे जमीन मैं मदद कर सकते हैं। इसी भावः से मैंने माँ से उनकी पत्नी के लिए प्रार्थना की। उनकी पत्नी को कैंसर था। उनका बचना नामुमकिन था। फ़िर मैंने नगर सेठ को यह कहा की इनकी बीमारी तो ठीक नही हो पायेगी। तब उन्होंने कहा की बीमारी ठीक न हो पाए तो क्या इनका दर्द कम करा सकते हो? तब मैंने माँ से प्रार्थना की और माँ ने मेरी बात सुनी। उस दिन के बाद नगर सेठ की पत्नी का दर्द लगभग ख़तम हो गया।
उनकी मृत्यु से पहले नगर सेठ ने मुझे फ़िर बुलवाया। और पुछा की क्या तुम्हे माँ काली का मन्दिर बनाना है रक्सौल मैं? मुझे कल रात माँ ने सपने मैं आके कहा की मैं तुम्हे मन्दिर बनने के लिए भूमि दे दूँ?
उनकी बात सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना न था। उन्होंने मुझे अपनी फुलवारी से अपनी पसंद का जमीन चुनने को कहा। और बोला जा जितना मन करे जमीन ले ले
मैं भाग के नीचे आया और अपने प्रथम शिष्य (नगर सेठ के भाई के बेटे किरण शंकर सर्राफ ) को बताया की आपके चाचा ने मुझे जमीन दे दिया है। यह सुन कर किरण चकित हो गए की जमीन कैसे दे दी उनके चाचा ने!!!
ऐसा उन्होंने इस लिए सोचा क्योंकि नगर सेठ की कंजूसी सभी जानते थे। उन्होंने आजतक कभी किसी को कुछ नही दिया था।फ़िर मैंने जमीन की बाउंड्री कराने के बाद अगले साल उसी जमीन पर फ़िर से माँ की पूजा शिवरात्रि वाले दिन संपन्न की।
घटना यही ख़तम नहीं होती। मन्दिर निर्मांड की इच्षा मन में लेके मैं अपनी साधना भी करता रहा। इस बीच मैंने अनेक साधना की.
Thursday, 2 October 2008
मेरी प्रथम साधना : शव साधना.
मुझे उस जंगल मैं कुछ पता नही था। अँधेरी रात में बाबाजी के साथ मैं साधना करने निकल पड़ा। वह साधना की तय्यारी पहले से ही कर के आए थे। उन्होंने अपनी झोली में से ५ मुंड निकले, और ५ जगह वेदी बनाई। फ़िर उन्होंने मुझे नर मुंड वाली वेदी पर बिठाया। उसके बाद उन्होंने कुछ मंत्रो का उच्चारण करवाया। और भैरव पूजन और भैरवी पूजन करवाया। तत्त्पस्चात मुझे उस बेदी से उठाया और नदी के घाट पर ले गए। जब मैं वह गया तो वह देखा की पहले से ही एक शव रखा हुआ था। मैं काफी भयभीत था तो बाबाजी ने कहा की भय की कोई बात नही है मैं हूँ ना। तब मेरा भय कुछ कम हुआ तो उन्होंने मुझे इस शव को अपने हाथों से स्नान कराने की आज्ञा दी। तब मैंने शव को नदी क पानी से स्नान कराया। स्नान कराने के बाद मैंने उनके कहे अनुसार शव का शरीर एक कपडे से पोछा,और शव पर सुगन्धित तेल लगाया। तत्त्पश्चात शव के उदार पर सिंदूर से एक यन्त्र बनाया। और उसके बाद उन्होंने मुझे उस शव के उदार पर बैठने को कहा। उसके बाद उन्होंने कुछ गोपनीय मंत्रो का उच्चारण करवाया।
शुरू के मंत्रो से कुछ खास प्रभाव नही पड़ा परन्तु आधी साधना बीतने के बाद जब उन्होंने एक भैरव मन्त्र का उच्चारण करवाया तब मैं भयभीत हुआ। क्योंकि यह मन्त्र कहते ही मैंने देखा की शव के शरीर मैं अनेको प्रकार के परिवर्तन होने लगे। उसका मुख और आँख हिलने लगे। तब एकायक भय के कारन मेरा मन्त्र रुक गया।
बाबाजी ने फ़िर आवाज़ लगायी "डर मत मैं हूँ तुझे कुछ नही होगा "
किसी तरह मैं मंत्र उच्चारण करता रहा और फ़िर बाबाजी मेरे समीप आ गए। और उस समय कही से वह एक बकरा ले आए। फ़िर मैंने उस बकरे की पूजा करी और फ़िर एक और मंत्र पढ़ाइस मंत्र के बाद मेरे शरीर से सांप, बिच्छु जैसे जंतु निकलने लगे। मैं फ़िर भयभीत हुआ तब बाबा ने फ़िर कहा "घबडा मत तेरी क्रिया सही जा रही है।" उसके बाद उन्होंने फ़िर से एक नया मंत्र बताया वह मंत्र कहते ही मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की कई छाया रूपी नर नारी मुझे पकड़ने आ रहे है। उस वक्त मुझसे बर्दाश्त नही हुआ और मैं चिल्लाया बाबा यह क्या हो रहा है?
बाबाजी ने कहा "अब क्या डर रहा है सब हो चुका,चल यह सब भैरव और भैरवी हैं ,इन्हे अब भोग लगा।"
उन्होंने एक कत्तार दिया और मुझसे उस बकरे की बलि चढाने को कहा। उन्होंने एक मंत्र बोला और मैंने बकरे की बलि चदायी.मैंने देखा की बलि चढ़ते ही वह छाया रूपी भैरव और भैरावियाँ उस भोग पर टूट पड़ीं।यह एक कभी न भुलाने वाला पल था। मैंने देखा की कुछ ही पल में सारा भोग ख़त्म हो चुका था।और पीछे से कुछ आवाजिएँ आ रहीं थी जिनको की मैं समझ नही पा रहा था।
फ़िर बाबा ने मुझे एक मदिरा की बोतल दी और कहा की उस बलि क स्थान पर यह बोतल भी रख दो। कुछ ही पल में बोतल की मदिरा भी ख़तम हो गई।और सारी छाया,आवाजिएँ भी ख़त्म हो गयीं।
छाया ने जाते समय कुछ कहा था जो भय की वजह से मुझे समझ नही आया। तब बाबाजी ने मुझे यह ज्ञात कराया की मुझे वाक् सिद्धि और पर काया प्रवेश सिद्धि प्राप्त हो चुकी है।इन सिद्धियों की क्रिया भी उन्होंने मुझे तब समझाई और इनके उपयोग करने की विधि तथा समय का भी ज्ञान दिया।
शव भी अब शांत हो चुका था। तब बाबाजी ने मुझसे उस शव का तांत्रिक श्राद्ध क्रिया करवाया।तत्त्पश्चात उस शव को नदी मैं विसर्जित करवाया। थोडी देर बाद सूर्य उदय भी हो गया। और हम वापस हथौडा आ गए। उन्होंने मुझे बीरगंज की बस मैं बिठा दिया और स्वयं वही रुक गए।

इस साधना से ही मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया.और मेरी तंत्र साधना के प्रति आस्था बढ़ गई।
शुरू के मंत्रो से कुछ खास प्रभाव नही पड़ा परन्तु आधी साधना बीतने के बाद जब उन्होंने एक भैरव मन्त्र का उच्चारण करवाया तब मैं भयभीत हुआ। क्योंकि यह मन्त्र कहते ही मैंने देखा की शव के शरीर मैं अनेको प्रकार के परिवर्तन होने लगे। उसका मुख और आँख हिलने लगे। तब एकायक भय के कारन मेरा मन्त्र रुक गया।
बाबाजी ने फ़िर आवाज़ लगायी "डर मत मैं हूँ तुझे कुछ नही होगा "
किसी तरह मैं मंत्र उच्चारण करता रहा और फ़िर बाबाजी मेरे समीप आ गए। और उस समय कही से वह एक बकरा ले आए। फ़िर मैंने उस बकरे की पूजा करी और फ़िर एक और मंत्र पढ़ाइस मंत्र के बाद मेरे शरीर से सांप, बिच्छु जैसे जंतु निकलने लगे। मैं फ़िर भयभीत हुआ तब बाबा ने फ़िर कहा "घबडा मत तेरी क्रिया सही जा रही है।" उसके बाद उन्होंने फ़िर से एक नया मंत्र बताया वह मंत्र कहते ही मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की कई छाया रूपी नर नारी मुझे पकड़ने आ रहे है। उस वक्त मुझसे बर्दाश्त नही हुआ और मैं चिल्लाया बाबा यह क्या हो रहा है?
बाबाजी ने कहा "अब क्या डर रहा है सब हो चुका,चल यह सब भैरव और भैरवी हैं ,इन्हे अब भोग लगा।"
उन्होंने एक कत्तार दिया और मुझसे उस बकरे की बलि चढाने को कहा। उन्होंने एक मंत्र बोला और मैंने बकरे की बलि चदायी.मैंने देखा की बलि चढ़ते ही वह छाया रूपी भैरव और भैरावियाँ उस भोग पर टूट पड़ीं।यह एक कभी न भुलाने वाला पल था। मैंने देखा की कुछ ही पल में सारा भोग ख़त्म हो चुका था।और पीछे से कुछ आवाजिएँ आ रहीं थी जिनको की मैं समझ नही पा रहा था।
फ़िर बाबा ने मुझे एक मदिरा की बोतल दी और कहा की उस बलि क स्थान पर यह बोतल भी रख दो। कुछ ही पल में बोतल की मदिरा भी ख़तम हो गई।और सारी छाया,आवाजिएँ भी ख़त्म हो गयीं।
छाया ने जाते समय कुछ कहा था जो भय की वजह से मुझे समझ नही आया। तब बाबाजी ने मुझे यह ज्ञात कराया की मुझे वाक् सिद्धि और पर काया प्रवेश सिद्धि प्राप्त हो चुकी है।इन सिद्धियों की क्रिया भी उन्होंने मुझे तब समझाई और इनके उपयोग करने की विधि तथा समय का भी ज्ञान दिया।
शव भी अब शांत हो चुका था। तब बाबाजी ने मुझसे उस शव का तांत्रिक श्राद्ध क्रिया करवाया।तत्त्पश्चात उस शव को नदी मैं विसर्जित करवाया। थोडी देर बाद सूर्य उदय भी हो गया। और हम वापस हथौडा आ गए। उन्होंने मुझे बीरगंज की बस मैं बिठा दिया और स्वयं वही रुक गए।

इस साधना से ही मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया.और मेरी तंत्र साधना के प्रति आस्था बढ़ गई।
साधना की शुरुआत.....
वर्ष १९८८ में आश्रम रोड से होते हुए में अपने घर की तरफ़ जा रहा था तभी एक मैले फटे कपडे पहने हुए व्यक्ति ने मुझे आवाज़ दी।मैं उनके पास गया तब उन्होंने कहा की मुझे मांस और चावल खिला बेटा। पर मेरे पास पैसे नही थे। परन्तु मैं संतो की बोहत इज्ज़त करता था अतः मैंने पास के एक होटल में उन्हे बिठाया और खाना खिलाया। होटल के मालिक से कहा की में पैसे ले के आ रहा हूँ। पैसे लेके आने के बाद उस व्यक्ति ने कहा की तुम मुझे अपने घर ले चलो। मैं मन ही मन डरा की अगर मैं इन्हे घर ले गया तो माँ नाराज़ होंगी। पर फ़िर भी उन्हे घर ले गया। घर पर उन्होंने चाय पीने की इक्षा व्यक्त की। मैंने सोचा की माँ से न कहूँ , इसी भय से मैं ख़ुद चाय बनाने लगा तो माँ ने आवाज़ लगायी। उन्हे अचरज हुआ की मैं क्यों चाय बना रहा हूँ, क्योंकि मैंने कभी कोई घर का काम नही किया था। फ़िर माँ उस व्यक्ति से मिलने नीचे आई तो वह व्यक्ति मेरी माँ के चरण पकड़ के रोने लगा। और बोला "माँ तू धन्य है की तुने ऐसे पुत्र को जनम दिया। इसको किसी विशेष कार्य के लिए भेजा गया है।"
फ़िर मैं उन्हे रोड तक उनको छोड़ने गया क्योंकि मुझे माँ से डर था की वोह नाराज़ हो जाएँगी। तब उस व्यक्ति ने मुझे पकड़ लिया और कहा की क्या तुम कुछ तांत्रिक साधना सीखोगे? इस बात को सुन के मुझे बोहत प्रसंता हुई क्योंकि मैं बचपन से ही तंत्र मंत्र के लिए रूचि रखता था। तो मैंने उन्हे हाँ कह दिया।
वह मेरा घर देख चुके थे इसलिए करीब १५ दिन बाद वह फ़िर मेरे घर पधारे और मुझे कहा की चल मैं तुझे साधना सिखाऊंगा मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। तब मैंने उनसे उनका परिचय पुछा। तब उन्होंने बताया की मैं तिबेत्तियन संत सूफी लामा हूँ और मैं नेपाल में रहता हूँ।
फ़िर मैंने उनसे पुछा की आप कौन सी साधना सिखायेंगे तब उन्होंने कहा की मैं तुम्हे १०० साधना सिखाऊंगा।मैं इतना खुश हुआ यह सुन कर की मैं १०० साधना सीखूंगा।
पर उन्होंने कहा की इसके लिए तुझे मेरे साथ आज ही चलना होगा। अब मैं क्या करता। मैंने घर पे बेतिया जाने का झूठ बोला और इनके साथ गया.वह मुझे नेपाल के ओर ले गए। मैं इस घटना से पहले नेपाल में बीरगंज से आगे कही नही गया था। पर उन्होंने एक बस पे बैठा कर मुझे हथोडा नामक स्थान से पहले ले गए।
और एक नदी पार करा कर मुझे एक घन घोर जंगल की ओर ले गए।
मुझे भूख लगने पे मैंने उनसे खाने की मांग की.बाबा ने मुझे बैठने को कहा और ख़ुद खाना लेने चले गए। कुछ ही समय मैं वह हमारे लिए मांस और चावल ले के आए।
मैं चकित रह गया की इतनी जल्दी इस घनघोर जंगल में भोजन कहा से आ गया!!! खाना खाने के बाद हम सो गए।जब मेरी नींद खुली तो चारो ओर घोर अँधेरा था। मैं बोहत डर चुका था की कही मैं किसी ग़लत संगती में तो नही फंस गया?
बड़ी हिम्मत कर के मैंने उस बाबा को आवाज़ लगायी। " बाबा आप कहा है?"
बाबा ने आवाज़ लगायी "अरे मैं तेरे पीछे बैठा हूँ" जब मैंने घूम के देखा तो उनके चारों तरफ़ एक रौशनी नज़र आ रही थी और वह स्वयं बैठे हुए थे।उन्होंने कहा की चल अब साधना का समय हो गया है।
फ़िर मैं उन्हे रोड तक उनको छोड़ने गया क्योंकि मुझे माँ से डर था की वोह नाराज़ हो जाएँगी। तब उस व्यक्ति ने मुझे पकड़ लिया और कहा की क्या तुम कुछ तांत्रिक साधना सीखोगे? इस बात को सुन के मुझे बोहत प्रसंता हुई क्योंकि मैं बचपन से ही तंत्र मंत्र के लिए रूचि रखता था। तो मैंने उन्हे हाँ कह दिया।
वह मेरा घर देख चुके थे इसलिए करीब १५ दिन बाद वह फ़िर मेरे घर पधारे और मुझे कहा की चल मैं तुझे साधना सिखाऊंगा मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। तब मैंने उनसे उनका परिचय पुछा। तब उन्होंने बताया की मैं तिबेत्तियन संत सूफी लामा हूँ और मैं नेपाल में रहता हूँ।
फ़िर मैंने उनसे पुछा की आप कौन सी साधना सिखायेंगे तब उन्होंने कहा की मैं तुम्हे १०० साधना सिखाऊंगा।मैं इतना खुश हुआ यह सुन कर की मैं १०० साधना सीखूंगा।
पर उन्होंने कहा की इसके लिए तुझे मेरे साथ आज ही चलना होगा। अब मैं क्या करता। मैंने घर पे बेतिया जाने का झूठ बोला और इनके साथ गया.वह मुझे नेपाल के ओर ले गए। मैं इस घटना से पहले नेपाल में बीरगंज से आगे कही नही गया था। पर उन्होंने एक बस पे बैठा कर मुझे हथोडा नामक स्थान से पहले ले गए।
और एक नदी पार करा कर मुझे एक घन घोर जंगल की ओर ले गए।
मुझे भूख लगने पे मैंने उनसे खाने की मांग की.बाबा ने मुझे बैठने को कहा और ख़ुद खाना लेने चले गए। कुछ ही समय मैं वह हमारे लिए मांस और चावल ले के आए।
मैं चकित रह गया की इतनी जल्दी इस घनघोर जंगल में भोजन कहा से आ गया!!! खाना खाने के बाद हम सो गए।जब मेरी नींद खुली तो चारो ओर घोर अँधेरा था। मैं बोहत डर चुका था की कही मैं किसी ग़लत संगती में तो नही फंस गया?
बड़ी हिम्मत कर के मैंने उस बाबा को आवाज़ लगायी। " बाबा आप कहा है?"
बाबा ने आवाज़ लगायी "अरे मैं तेरे पीछे बैठा हूँ" जब मैंने घूम के देखा तो उनके चारों तरफ़ एक रौशनी नज़र आ रही थी और वह स्वयं बैठे हुए थे।उन्होंने कहा की चल अब साधना का समय हो गया है।
मेरा जीवन माँ से मिलने से पहले.....
स्व। डॉ बिंदा प्रसाद वर्मा और स्व सरस्वती देवी की संतान बन मेरा जनम २० दिसम्बर १९६६ को बिहार के पूर्वी चम्पारण जिला के रक्सौल नामक स्थान पर हुआ।
प्रारंभिक शिक्षा रक्सौल से प्राप्त करने के उपरांत मैं १९८७ में बंगलोर तकनिकी महाविद्यालय में नामांकन हेतु गया और शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात्री में ट्रेन में स्वयं भगवान् शिव के दर्शन हुए।
तत्षण ही मुझे शिव के गुरुत्व की प्राप्ति हुई और जीवन की धारा ही बदल गई।
एक बालक युवा साधक बन गया।
अब मेरा अधिकाधिक समय पूजन और ध्यान में व्यतीत होने लगा। माता पिता इस व्यवहार से काफी चिंतित रहने लगे। पिताजी ने रोका भी और विवाह के बंधन में बाँध के इस असामान्य व्यवहार को दूर करने का प्रयास भी किया। तब स्वयं माँ काली ने दर्शन दे कर पिताजी से कहा की मैं उनका बेटा हूँ और मेरा जनम उनके कार्यो को करने के लिए हुआ है। अब इस युवा साधक का ध्यान माँ काली की पूजा, अर्चना ,आराधना में बीतने लगा और उनके प्रति आसक्ति उत्तरोतर बढती गई।
इस तरह अपनी जीवन की घटना को व्यक्त करने का उद्देश्य है इस धरती पर लोगों को यह बताना की माँ की आराधना ही जीवन है।
मैं प्रयास करूँगा की इस ब्लॉग के माध्यम से सब को यह बता सकूं की माँ क्या है,उनकी शक्ति क्या है,और उनका संदेश आप सब तक पहुँचा सकूँ।
सेवा में
सेवक संजय नाथ.
प्रारंभिक शिक्षा रक्सौल से प्राप्त करने के उपरांत मैं १९८७ में बंगलोर तकनिकी महाविद्यालय में नामांकन हेतु गया और शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात्री में ट्रेन में स्वयं भगवान् शिव के दर्शन हुए।
तत्षण ही मुझे शिव के गुरुत्व की प्राप्ति हुई और जीवन की धारा ही बदल गई।
एक बालक युवा साधक बन गया। अब मेरा अधिकाधिक समय पूजन और ध्यान में व्यतीत होने लगा। माता पिता इस व्यवहार से काफी चिंतित रहने लगे। पिताजी ने रोका भी और विवाह के बंधन में बाँध के इस असामान्य व्यवहार को दूर करने का प्रयास भी किया। तब स्वयं माँ काली ने दर्शन दे कर पिताजी से कहा की मैं उनका बेटा हूँ और मेरा जनम उनके कार्यो को करने के लिए हुआ है। अब इस युवा साधक का ध्यान माँ काली की पूजा, अर्चना ,आराधना में बीतने लगा और उनके प्रति आसक्ति उत्तरोतर बढती गई।
इस तरह अपनी जीवन की घटना को व्यक्त करने का उद्देश्य है इस धरती पर लोगों को यह बताना की माँ की आराधना ही जीवन है।
मैं प्रयास करूँगा की इस ब्लॉग के माध्यम से सब को यह बता सकूं की माँ क्या है,उनकी शक्ति क्या है,और उनका संदेश आप सब तक पहुँचा सकूँ।
सेवा में
सेवक संजय नाथ.
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