Monday, 17 November, 2008

वामपीठ की स्थापना- सेवकसंजयनाथतांत्रिककालीमन्दिर के रूप में...


साधना करने के साथ साथ १९९० से मैंने मन्दिर निर्मांड का कार्य भी ज़ोर शोर से शुरू कर दिया। उस दौरान मेरी उम्र बोहत कम थी और मेरे भक्तो की भी संख्या कम थी। मेरा सपना था की मैं बिहार राज्य मैं सबसे ऊँचा मन्दिर बन्वओं जिसके हर खंड में अनेकों देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित हो। इस सोच को मन में लिए मैं माँ की आराधना करता रहा। माँ की कृपा मेरे ऊपर सदा बनी रही और मेरे भक्तो ने मुझे मन्दिर बनाने में अपने समार्थ अनुरूप सहयोग दिया। मुझे फ़िर भी लगा की अभी कुछ और करना है इसलिए मैंने टी.म.ठ्कर की दावा कंपनी में काम करना शुरू किया। वहा काम करने से जितना पैसा एकत्रित हुआ वह सब मैंने मन्दिर के भू तल निर्मांड में लगा दिया। उस समय मैं अपने माता पिता के साथ रहता था इसलिए मेरा अपना खर्च भी कुछ नही था।
मेरी इक्षा थी की शिवरात्रि तक मैं अपने साधना ग्रह में माँ काली और गुरु भगवान् शिव की स्थापना कर दूँ।

पर मूर्ती खरीदने के लिए पैसों की कमी थी। इस बार फ़िर माँ ने अपनी कृपा दिखायी और उनकी कृपा से एक दिन स्वयं मेरे प्रथम शिष्य किरण शंकर सर्राफ जी ने अपनी ओर से मन्दिर की प्रतिमा दान देने की अपनी इक्षा मुझसे व्यक्त की। साथ ही मेरे एक और शिष्य श्री नन्द जी बरनवाल ने शिव लिंग की प्रतिमा दान करने का निश्चय किया। मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा और मैं नन्द जी और राज किशोर जी को साथ ले के शीघ्र ही बनारस जा पहुँचा। वहा के जयपुर मूर्ती भण्डार में मैंने माँ की अनेकों प्रतिमाएं देखीं। एक प्रतिमा ने मुझे बोहत आकर्षित किया।
उसका मूल्य ३५००० रुपए था। किरण जी से मुझे २५००० रुपए मिले थे और मेरे पास ख़ुद के पैसे मिला कर सिर्फ़ ३१००० रुपए बन पा रहे थे। दूकानदार संजय गौर से मैंने बोहत कहा की वोह मुझे प्रतिमा ३१००० में दे दे। परन्तु वोह नही माना। मैंने हठ कर लिया था की जब तक वो प्रतिमा नही लूँगा तब तक अन्न जल ग्रहण नही करूँगा। दूकानदार और उसके पिताजी दोनों ही इतने कम दाम मैंने मूर्ति देने को तैयार नही थे। शाम तक बिना कुछ ग्रहण किए वही बैठा रहा। अंत में मेरी आँखों से आंसू गिरने लगे। तब दुकानदार के पिताजी को मेरे हठ का पता चला। और वो प्रतिमा ३१००० में देने को राजी हो गए। मैंने उन्हे आशीर्वाद दिया की यह ५००० हज़ार का मूल्य उन्हे लाखों में माँ से वापस मिलेगा। फ़िर मैं माँ की मूर्ति और शिव लिंग ले के वहां से निकला। आज वही जयपुर मूर्ति भण्डार अरबो की कमाई कर रहा है और वहां के दूकानदार मेरे भक्त बन गए हैं और बिना पैसे के भी वो आज मूर्ति देने के लिए व्याकुल रहते हैं।

अब मेरे पास सिर्फ़ १५०० रुपए बचे थे और रक्सौल मूर्ति के जाने के लिए जीप का दाम ३००० से ज्यादा था। मैं सोच ही रहा था की मूर्ति को सुरक्षित कैसे ले जाओं। तभी कही से एक भांग पिया हुआ ड्राईवर एक जीप में स्वयं आया और उसने अपने मालिक से पुछा की कहीं सामन ले जाना है? मालिक ने उसे हमारे बारे में बताया की रक्सौल जाना है। आश्चर्य की बात यह थी की उसने स्वयं ही १५०० रुपए मांगे जितने की मेरे पास थे। तब हम मूर्ति ले के रक्सौल के लिए रवाना हो गए। उस ड्राईवर को मैंने शिव का साक्षात् रूप माना। और रक्सौल जाके उसे अपनी तरफ़ से २५१ रुपए दिए और अपने घर खाना भी खिलाया। वह भी बोहत खुश होके वापस गया।
इस प्रकार १९ फरवरी १९९३ को माँ काली और शिव लिंग की तांत्रिक पद्दति से मेरे साधना ग्रह में मेरे द्वारा स्थापना पूर्ण हुई।
उस दिन मैंने माँ से पहली बार एक प्राथना की। मैंने उनसे कहा की "हे माँ हर साल आप एक खंड बनवा देना इस से अधिक मैं कुछ नही मांगता। " और यह भी एक सत्य है की आज तक हर साल माँ की कृपा से मैं कुछ न कुछ बनवा ही रहा हूँ... १९९९ में इस मन्दिर के सात खंड पूरे हुए।

Thursday, 6 November, 2008

मेरी कामरूप कामख्या यात्रा...


१९९४ में आमुबाची पर्व पर कामख्या में मैंने १६ दिन की अपनी साधना को पूर्ण किया।
इसमें मुख्यतः भैरवी चक्र साधना, योनी पूजा और भैरव चक्र जैसी साधनायें थीं। बिना इन साधना के कोई भी व्यक्ति वाम मार्गी नही हो सकता। यह वाम मार्ग के सबसे कठिन साधनायें हैं। इन साधनाओं की क्रिया को सार्वजनिक करना उचित नही होता। इसलिए यह गुरु शिष्य परम्परा से प्राप्त होता है। यह सभी अति गोपनीय साधना हैं। इसलिए इस क्रिया को यहाँ प्रकाशित नही कर रहा हूँ।

भैरवी चक्र साधना:
इस साधना को ७ दिनों में पूरा किया जाता है। इस साधना में सबसे कम उम्र के भैरव को शिव स्वरुप मान के शिव की आसन पे बिठाया जाता है और सब से कम उम्र की भैरवी को माँ काली का स्वरुप मान कर काली के आसन पर बिठाया जाता है। यह क्रिया रात्रि १० बजे के बाद शुरू की जाती है। इसमें सभी भैरव और भैरवी दिगंबर रूप से साधना करते हैं। इस साधना के पुरोहित को कौलाचार्य कहते है और उनके आदेश को शिव का आदेश समझ कर यह साधना की जाती है। वहा अगर वो धर्म विरुद्ध बात भी कहें तो उसे वेदतुल्य समझा जाता है।
तत्पश्चात कौलाचार्य उस भैरव और भैरवी की पूजा शुरू करते हैं जिसे शिव और काली के रूप में स्थापित किया जाता है। भाग्यवश कम उम्र होने के कारन इस पूजा में उस शिव रूप का स्थान मुझे ही मिला था एवं भैरवी रूप में शिवानी नामक एक बंगाली साध्वी को माँ काली का रूप मिला था।
७ दिनों तक यह क्रिया रात्री १० बजे से सुबह ३ बजे तक की जाती थी। इस क्रिया को बोहत सारे भैरव, भैरवी पूरा करने में विफल रहे। पर माँ की कृपा से मैंने इसे दूसरी बार में ही पूरा कर लिया। इस साधना में अघोर भैरव और भैरवी मंत्र का प्रयोग किया जाता है जो की किसी गुरु की सहायता से ही करना चाहिए अन्यथा अनर्थ भी हो सकता है।

भैरव चक्र साधना:
यह साधना ३ दिन में पूरा किया जाता है। इस साधना को उस शमशान में पूरा किया जाता है जहा पर कम से कम नित्य एक शव जलता रहता हो। कामख्या और ब्रम्हपुत्र नदी के समीप एक शमशान में अष्टमी की रात को यह साधना सभी भैरवो ने शुरू की। इस साधना में भैरवी का प्रवेश निषेध होता है। यह साधना रात्री १२ बजे के बाद शुरू की जाती है और ब्रम्ह मुहूर्त तक चलती है। इस साधना में प्रथम दिन स्नान करने के बाद पूरे शरीर में भभूत लगा कर ३ दिनों तक शम्शाम में ही शिव के अघोर रूप में वास किया जाता है। इसमें प्रथम दिन भैरव के आकर्षण मंत्र मौरंग दौरंग मंत्र का जाप किया जाता है. दुसरे दिन झांग झांग झांग हांग हांग हांग हेंग हेंग महामंत्र से सभी क्रियाएँ की जाती हैं। फ़िर तीसरे दिन शमशान भैरव के महा मंत्र से साधना करने के बाद इस भैरव साधना का विसर्जन किया जाता है। भैरव साधना के बिना कोई भी वाम मार्गी पुरूष साधक नही हो सकता। जो साधक इस साधना को सफलता से पूरा कर लेता है उसके इक्षा मात्र से भक्तो के कष्ट दूर हो जाते हैं। अतः इसकी तांत्रिक साधना में बहुत महत्व है अतः आम लोगो से गुप्त रखा जाता है।

कामख्या योनी पूजा:
यह क्रिया १ दिवसीय होती है। इस पूजा में भैरव और भैरवी का होना अति आवश्यक होता है। तंत्र में योनी को ही श्रृष्टि का मुख्या द्वार बताया गया है। इसलिए जो उत्तम साधक होते हैं वह अपने किसी तांत्रिक साधना को करने से पहले योनी साधना अवश्य करते हैं। जो योनी का आदर नही करते उनपर माँ कभी प्रसन्न नही होती। इस पूजा की विधि को जान ने के लिए किसी वामाचार्य के पास जाना पड़ता है।यह भी गुप्त क्रिया है.

Saturday, 4 October, 2008

तारा पीठ साधना--तंत्र साधना की तरफ़ एक कदम और...


१९९० में दुर्गा पूजा के समय मैंने स्वयं तारा पीठ जा कर अपने २ शिष्यों के साथ फ़िर से शव साधना की। शमशान पहुच कर एक अघोरी बाबा से मैंने पुछा की चरण पादुका तो मैंने देखा नही है। मुझे शव साधना करनी है तुम मुझे वह तक पहोचा दो। वह मुझे चरण पादुका तक ले गए। वहा पहले से ही एक साधक साधना कर रहा था। तब में बोहत दुखी हुआ मुझे लगा की मैं तो अब साधना नही कर पाउँगा
मुझे उदास देख कर उस अघोरी ने कहा की बाबा अगर आप चाहो तो एक जगह और है जहा की आप साधना कर सकते हो। मैंने उनसे उस जगह के विषय मैं जानकारी ली।
उस जगह कभी तारा पीठ के प्रथम साधक वामाखेपा ने अपनी साधना की थी। मैं बोहत प्रस्सन हुआ की मुझे उस जगह साधना करने का अवसर प्राप्त हुआ. लेकिन फ़िर उस अघोरी ने मुझे बताया की इस स्थल पर आज तक जितने भी साधक साधना करने आए वे या तो पागल हो गए या फ़िर मृत्यु को प्राप्त हो गए।
यह सुन कर मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। मैं चाहता था की मैं कुछ अलग और कठिन साधना करूँ। इसलिए मैंने संकल्प किया की अब तो मैं वही साधना करूँगा.
मैं वहा गया और रात में शव साधना प्रारम्भ कर दिया। इस बार भी पहले के जैसे चमत्कार हुए और शमशान में साधना करने वाले सभी अघोरी यह देखने लगे की एक २४ साल का युवा कितनी कठिन साधना कर रहा है।
उस रात पहली बार मैंने स्वतंत्र रूप से स्वयं साधना की थी। मेरी इस साधना से पूरा शमशान जाग उठा था, जो की अपने आप में ही एक अद्वित्य घटना थी।
रात भर मैंने कई गोपनीय क्रियाएं की और अंत में मैंने अपनी साधना प्रातः काल ५ बजे संपूर्ण की। वामाखेपा की साधना के बाद सिर्फ़ मैंने ही वहां पर यह साधना पूर्ण की थी। इस से मेरा मनोबल और बढ़ गया और तंत्र साधना के प्रति मेरा विश्वास और गहरा हो गया।

सुबह माँ तारा के दर्शन के बाद हम फ़िर से उस शमशान को देखने आए। फ़िर से उस अघोरी से मैंने बात की। सारे अघोरी मुझसे शिक्षा प्रतप्त करने के लिए विनीति करने लगे। तब मैंने उन्हे समझाया की मैंने तुंरत ही साधना सिद्धि में कदम रखा है. मैंने उनसे वशिष्ठ मुनि की चरम पादुका के पास ले जाने का अनुरोध किया। उस अघोरी बाबाके साथ मैं वहां पोहांचा।
चरण पादुका पे मैंने देखा की तीन कुवारी कन्याएं पूजा कर रही थी। मैं बहार ही रुक गया और उनकी पूजा समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगा। वह तीनो मन्दिर के बाहर आ कर खड़ी हो गयीं। मैंने अपने शिष्यों को चरण पादुका के दर्शन के लिए भेजा। मैंने देखा की वोह तीन कन्याएं वही खड़ी थी। अंत में मैं भी पूजा करने के लिए चरण पादुका के पास गया। पूजा के बाद उन तीनो कन्याओं ने मुझे आवाज़ दे कर रोका और अपने हाथ से मुझे चंदन लगाया।

मैंने उनसे उनका परिचय पुछा तब उन्होंने कहा की वह पटना के पुनैचोव्क नमाक स्ताहन पर रहती हैं। मैंने उनसे उनका पता ले लिया और फ़िर वह वह से चली गयीं।
मैं भी वापस माँ तारा मन्दिर के बहार कुछ किताबें देखने लगा । वही मुझे वमखेपा की जीवनी नज़र आई। मैंने उसे ख़रीदा और पढने लगा। पढने के क्रम में मैंने यह जाना की वशिष्ठ पादुका के बाहर स्वयं वमखेपा को भी तीन कुवारी कन्याओं के रूप में स्वयं माँ ने दर्शन दिए थे और उन्हे भी चंदन का तिलक लगाया था।
यह पढ़ते ही मैं व्याकुल हो उठा और उन तीनो कन्याओं को खोजने लगा। लेकिन फ़िर भी वोह तीनो मुझे कही दिखाई नही दी।
मुझे बोहुत ग्लानी हुई की काश मैंने जीवनी पहले पढ़ी होती तो मैं माँ का चरण पकड़ लेता जब उन्होंने मुझे दर्शन दिया।
उसके बाद हम लोग कलकत्ता के लिए रवाना हो गए। कलकत्ता पोहचने के बाद एक मारवाडी धर्मशाला मैं रुके और भूतनाथ के दर्शन किए।
फ़िर रात में भूतनाथ शमशान में भैरव साधना शुरू किया। उसके बाद दाख्शिनेश्वर मन्दिर में माँ काली के दर्शन करने के बाद वापस रक्सौल के लिए प्रस्थान किया.

Friday, 3 October, 2008

माँ काली के मन्दिर के निर्माण की शुरुआत...


शव साधना के तुंरत बाद माँ काली ने स्वयं मुझे एक दिन स्वप्न में कहा की जा मेरी एक मन्दिर की स्थापना रक्सौल में कर।
इस स्वप्न के बाद में सोच में पड़ गया की यह कैसे सम्भव है? ना तो मेरे पास पैसा था न ही जमीन। मैं सोच ही रहा था की मेरे घर के सामने रहने वाले सलेस टैक्स ऑफिसर "गोपाल प्रासाद जैसवाल" से जाके मैंने इस बारे मैं बात की।उन्होंने कहा की जमीन जब मिले तब मिले आप एक माँ काली की प्रतिमा पहले बना कर पंडाल मैं उसकी पूजा शुरू करें। मैं इस बात से खुश हुआ।
शिवरात्रि आने वाली थी इसलिए मैंने तय किया की इस शिवरात्रि मैं माँ काली की मिटटी की मूर्ति बना कर पूजा करूँगा और इस काम मैं लग गया.गोपाल प्रसाद जैसवाल ने माँ की प्रतिमा अपनी तरफ़ से भेंट की। और साथियों की सहायता से मैंने विधिपूर्वक माँ की पूजा शिवरात्रि के दिन पूर्ण की। इस पूजा से पहले रक्सौल में कही भी काली की पूजा नही हुई थी और कोई काली मन्दिर की स्थापना भी नही हुई थी. लोग माँ काली से डरते थे और मुझे भी डराने की कोशिश की। परन्तु मैं निष्ठां पूर्वक साधना करता रहा। इस पूजा के विसर्जन के ५-७ दिन बाद ही रक्सौल के नगर सेठ "जय किशन राम" ने मुझे अपने घर बुलवाया और मुझसे कहा की मैंने सुना है की तू माँ की पूजा करता है , मेरी पत्नी बोहत बीमार है, क्या तुम कुछ कर सकते हो?
मैंने सोचा की अगर मैं इनकी कुछ मदद कर सका तो शायद यह माँ के मन्दिर बनने मैं मुझे जमीन मैं मदद कर सकते हैं। इसी भावः से मैंने माँ से उनकी पत्नी के लिए प्रार्थना की। उनकी पत्नी को कैंसर था। उनका बचना नामुमकिन था। फ़िर मैंने नगर सेठ को यह कहा की इनकी बीमारी तो ठीक नही हो पायेगी। तब उन्होंने कहा की बीमारी ठीक न हो पाए तो क्या इनका दर्द कम करा सकते हो? तब मैंने माँ से प्रार्थना की और माँ ने मेरी बात सुनी। उस दिन के बाद नगर सेठ की पत्नी का दर्द लगभग ख़तम हो गया।
उनकी मृत्यु से पहले नगर सेठ ने मुझे फ़िर बुलवाया। और पुछा की क्या तुम्हे माँ काली का मन्दिर बनाना है रक्सौल मैं? मुझे कल रात माँ ने सपने मैं आके कहा की मैं तुम्हे मन्दिर बनने के लिए भूमि दे दूँ?
उनकी बात सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना न था। उन्होंने मुझे अपनी फुलवारी से अपनी पसंद का जमीन चुनने को कहा। और बोला जा जितना मन करे जमीन ले ले
मैं भाग के नीचे आया और अपने प्रथम शिष्य (नगर सेठ के भाई के बेटे किरण शंकर सर्राफ ) को बताया की आपके चाचा ने मुझे जमीन दे दिया है। यह सुन कर किरण चकित हो गए की जमीन कैसे दे दी उनके चाचा ने!!!
ऐसा उन्होंने इस लिए सोचा क्योंकि नगर सेठ की कंजूसी सभी जानते थे। उन्होंने आजतक कभी किसी को कुछ नही दिया था।फ़िर मैंने जमीन की बाउंड्री कराने के बाद अगले साल उसी जमीन पर फ़िर से माँ की पूजा शिवरात्रि वाले दिन संपन्न की।

घटना यही ख़तम नहीं होती। मन्दिर निर्मांड की इच्षा मन में लेके मैं अपनी साधना भी करता रहा। इस बीच मैंने अनेक साधना की.

Thursday, 2 October, 2008

मेरी प्रथम साधना : शव साधना.

मुझे उस जंगल मैं कुछ पता नही था। अँधेरी रात में बाबाजी के साथ मैं साधना करने निकल पड़ा। वह साधना की तय्यारी पहले से ही कर के आए थे। उन्होंने अपनी झोली में से ५ मुंड निकले, और ५ जगह वेदी बनाई। फ़िर उन्होंने मुझे नर मुंड वाली वेदी पर बिठाया। उसके बाद उन्होंने कुछ मंत्रो का उच्चारण करवाया। और भैरव पूजन और भैरवी पूजन करवाया। तत्त्पस्चात मुझे उस बेदी से उठाया और नदी के घाट पर ले गए। जब मैं वह गया तो वह देखा की पहले से ही एक शव रखा हुआ था। मैं काफी भयभीत था तो बाबाजी ने कहा की भय की कोई बात नही है मैं हूँ ना। तब मेरा भय कुछ कम हुआ तो उन्होंने मुझे इस शव को अपने हाथों से स्नान कराने की आज्ञा दी। तब मैंने शव को नदी क पानी से स्नान कराया। स्नान कराने के बाद मैंने उनके कहे अनुसार शव का शरीर एक कपडे से पोछा,और शव पर सुगन्धित तेल लगाया। तत्त्पश्चात शव के उदार पर सिंदूर से एक यन्त्र बनाया। और उसके बाद उन्होंने मुझे उस शव के उदार पर बैठने को कहा। उसके बाद उन्होंने कुछ गोपनीय मंत्रो का उच्चारण करवाया।
शुरू के मंत्रो से कुछ खास प्रभाव नही पड़ा परन्तु आधी साधना बीतने के बाद जब उन्होंने एक भैरव मन्त्र का उच्चारण करवाया तब मैं भयभीत हुआ। क्योंकि यह मन्त्र कहते ही मैंने देखा की शव के शरीर मैं अनेको प्रकार के परिवर्तन होने लगे। उसका मुख और आँख हिलने लगे। तब एकायक भय के कारन मेरा मन्त्र रुक गया।
बाबाजी ने फ़िर आवाज़ लगायी "डर मत मैं हूँ तुझे कुछ नही होगा "
किसी तरह मैं मंत्र उच्चारण करता रहा और फ़िर बाबाजी मेरे समीप आ गए। और उस समय कही से वह एक बकरा ले आए। फ़िर मैंने उस बकरे की पूजा करी और फ़िर एक और मंत्र पढ़ाइस मंत्र के बाद मेरे शरीर से सांप, बिच्छु जैसे जंतु निकलने लगे। मैं फ़िर भयभीत हुआ तब बाबा ने फ़िर कहा "घबडा मत तेरी क्रिया सही जा रही है।" उसके बाद उन्होंने फ़िर से एक नया मंत्र बताया वह मंत्र कहते ही मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की कई छाया रूपी नर नारी मुझे पकड़ने आ रहे है। उस वक्त मुझसे बर्दाश्त नही हुआ और मैं चिल्लाया बाबा यह क्या हो रहा है?
बाबाजी ने कहा "अब क्या डर रहा है सब हो चुका,चल यह सब भैरव और भैरवी हैं ,इन्हे अब भोग लगा।"
उन्होंने एक कत्तार दिया और मुझसे उस बकरे की बलि चढाने को कहा। उन्होंने एक मंत्र बोला और मैंने बकरे की बलि चदायी.मैंने देखा की बलि चढ़ते ही वह छाया रूपी भैरव और भैरावियाँ उस भोग पर टूट पड़ीं।यह एक कभी न भुलाने वाला पल था। मैंने देखा की कुछ ही पल में सारा भोग ख़त्म हो चुका था।और पीछे से कुछ आवाजिएँ आ रहीं थी जिनको की मैं समझ नही पा रहा था।
फ़िर बाबा ने मुझे एक मदिरा की बोतल दी और कहा की उस बलि क स्थान पर यह बोतल भी रख दो। कुछ ही पल में बोतल की मदिरा भी ख़तम हो गई।और सारी छाया,आवाजिएँ भी ख़त्म हो गयीं।
छाया ने जाते समय कुछ कहा था जो भय की वजह से मुझे समझ नही आया। तब बाबाजी ने मुझे यह ज्ञात कराया की मुझे वाक् सिद्धि और पर काया प्रवेश सिद्धि प्राप्त हो चुकी है।इन सिद्धियों की क्रिया भी उन्होंने मुझे तब समझाई और इनके उपयोग करने की विधि तथा समय का भी ज्ञान दिया।
शव भी अब शांत हो चुका था। तब बाबाजी ने मुझसे उस शव का तांत्रिक श्राद्ध क्रिया करवाया।तत्त्पश्चात उस शव को नदी मैं विसर्जित करवाया। थोडी देर बाद सूर्य उदय भी हो गया। और हम वापस हथौडा आ गए। उन्होंने मुझे बीरगंज की बस मैं बिठा दिया और स्वयं वही रुक गए।

इस साधना से ही मेरे जीवन में एक नया मोड़ आया.और मेरी तंत्र साधना के प्रति आस्था बढ़ गई।

साधना की शुरुआत.....

वर्ष १९८८ में आश्रम रोड से होते हुए में अपने घर की तरफ़ जा रहा था तभी एक मैले फटे कपडे पहने हुए व्यक्ति ने मुझे आवाज़ दी।मैं उनके पास गया तब उन्होंने कहा की मुझे मांस और चावल खिला बेटा। पर मेरे पास पैसे नही थे। परन्तु मैं संतो की बोहत इज्ज़त करता था अतः मैंने पास के एक होटल में उन्हे बिठाया और खाना खिलाया। होटल के मालिक से कहा की में पैसे ले के आ रहा हूँ। पैसे लेके आने के बाद उस व्यक्ति ने कहा की तुम मुझे अपने घर ले चलो। मैं मन ही मन डरा की अगर मैं इन्हे घर ले गया तो माँ नाराज़ होंगी। पर फ़िर भी उन्हे घर ले गया। घर पर उन्होंने चाय पीने की इक्षा व्यक्त की। मैंने सोचा की माँ से न कहूँ , इसी भय से मैं ख़ुद चाय बनाने लगा तो माँ ने आवाज़ लगायी। उन्हे अचरज हुआ की मैं क्यों चाय बना रहा हूँ, क्योंकि मैंने कभी कोई घर का काम नही किया था। फ़िर माँ उस व्यक्ति से मिलने नीचे आई तो वह व्यक्ति मेरी माँ के चरण पकड़ के रोने लगा। और बोला "माँ तू धन्य है की तुने ऐसे पुत्र को जनम दिया। इसको किसी विशेष कार्य के लिए भेजा गया है।"
फ़िर मैं उन्हे रोड तक उनको छोड़ने गया क्योंकि मुझे माँ से डर था की वोह नाराज़ हो जाएँगी। तब उस व्यक्ति ने मुझे पकड़ लिया और कहा की क्या तुम कुछ तांत्रिक साधना सीखोगे? इस बात को सुन के मुझे बोहत प्रसंता हुई क्योंकि मैं बचपन से ही तंत्र मंत्र के लिए रूचि रखता था। तो मैंने उन्हे हाँ कह दिया।
वह मेरा घर देख चुके थे इसलिए करीब १५ दिन बाद वह फ़िर मेरे घर पधारे और मुझे कहा की चल मैं तुझे साधना सिखाऊंगा मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। तब मैंने उनसे उनका परिचय पुछा। तब उन्होंने बताया की मैं तिबेत्तियन संत सूफी लामा हूँ और मैं नेपाल में रहता हूँ।
फ़िर मैंने उनसे पुछा की आप कौन सी साधना सिखायेंगे तब उन्होंने कहा की मैं तुम्हे १०० साधना सिखाऊंगा।मैं इतना खुश हुआ यह सुन कर की मैं १०० साधना सीखूंगा।
पर उन्होंने कहा की इसके लिए तुझे मेरे साथ आज ही चलना होगा। अब मैं क्या करता। मैंने घर पे बेतिया जाने का झूठ बोला और इनके साथ गया.वह मुझे नेपाल के ओर ले गए। मैं इस घटना से पहले नेपाल में बीरगंज से आगे कही नही गया था। पर उन्होंने एक बस पे बैठा कर मुझे हथोडा नामक स्थान से पहले ले गए।
और एक नदी पार करा कर मुझे एक घन घोर जंगल की ओर ले गए।
मुझे भूख लगने पे मैंने उनसे खाने की मांग की.बाबा ने मुझे बैठने को कहा और ख़ुद खाना लेने चले गए। कुछ ही समय मैं वह हमारे लिए मांस और चावल ले के आए।
मैं चकित रह गया की इतनी जल्दी इस घनघोर जंगल में भोजन कहा से आ गया!!! खाना खाने के बाद हम सो गए।जब मेरी नींद खुली तो चारो ओर घोर अँधेरा था। मैं बोहत डर चुका था की कही मैं किसी ग़लत संगती में तो नही फंस गया?
बड़ी हिम्मत कर के मैंने उस बाबा को आवाज़ लगायी। " बाबा आप कहा है?"
बाबा ने आवाज़ लगायी "अरे मैं तेरे पीछे बैठा हूँ" जब मैंने घूम के देखा तो उनके चारों तरफ़ एक रौशनी नज़र आ रही थी और वह स्वयं बैठे हुए थे।उन्होंने कहा की चल अब साधना का समय हो गया है।

मेरा जीवन माँ से मिलने से पहले.....

स्व। डॉ बिंदा प्रसाद वर्मा और स्व सरस्वती देवी की संतान बन मेरा जनम २० दिसम्बर १९६६ को बिहार के पूर्वी चम्पारण जिला के रक्सौल नामक स्थान पर हुआ। 
प्रारंभिक शिक्षा रक्सौल से प्राप्त करने के उपरांत मैं १९८७ में बंगलोर तकनिकी महाविद्यालय में नामांकन हेतु गया और शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। रात्री में ट्रेन में स्वयं भगवान् शिव के दर्शन हुए।
तत्षण ही मुझे शिव के गुरुत्व की प्राप्ति हुई और जीवन की धारा ही बदल गई।
एक बालक युवा साधक बन गया।
अब मेरा अधिकाधिक समय पूजन और ध्यान में व्यतीत होने लगा। माता पिता इस व्यवहार से काफी चिंतित रहने लगे। पिताजी ने रोका भी और विवाह के बंधन में बाँध के इस असामान्य व्यवहार को दूर करने का प्रयास भी किया। तब स्वयं माँ काली ने दर्शन दे कर पिताजी से कहा की मैं उनका बेटा हूँ और मेरा जनम उनके कार्यो को करने के लिए हुआ है। अब इस युवा साधक का ध्यान माँ काली की पूजा, अर्चना ,आराधना में बीतने लगा और उनके प्रति आसक्ति उत्तरोतर बढती गई।
इस तरह अपनी जीवन की घटना को व्यक्त करने का उद्देश्य है इस धरती पर लोगों को यह बताना की माँ की आराधना ही जीवन है।
मैं प्रयास करूँगा की इस ब्लॉग के माध्यम से सब को यह बता सकूं की माँ क्या है,उनकी शक्ति क्या है,और उनका संदेश आप सब तक पहुँचा सकूँ।

सेवा में
सेवक संजय नाथ.