Friday, 30 July, 2010

सावन माह में भस्म लगाने का महात्म

सावन माह में भगवान शिव पर भस्म चढ़ाना एवं भस्म का त्रिपुंड बनाना कोटि महायज्ञ करने के सामान होता है.
साथ साथ उस भस्म कों साधक अपने मस्तक एवं अनेक अंगों पर लगते हैं तो उसके अलग अलग फल प्राप्त होते हैं.

भस्म दो प्रकार के होते हैं:

१. महा भस्म
२. स्वल्प भस्म

महा भस्म शिवजी का मुख्य स्वरुप है. पर स्वल्प भस्म की अनेक शाखाएं हैं स्त्रोत, स्मार्त और लौकिक भस्म अत्यंत प्रसिद्द स्वल्प भस्म की शाखाएं हैं.

जो भस्म वेद की रीति से धारण की जाती हैं उसे स्त्रोत भस्म कहा जाता है,
जो भस्म स्मृति अथवा पुरानो की रीति से धारण की जाती है उसे स्मार्त कहते हैं.
जो भस्म सांसारिक अग्नि से उत्पन्न होती है और धारण की जाती है उसे लौकिक कहा जाता  है.

स्त्रोत तथा स्मार्त भस्म सिर्फ आत्म ज्ञानी ब्रह्मण एवं सन्यासियों कों ही धारण करना चाहिए लेकिन लौकिक भस्म सभी वर्ण के लोग धारण कर सकते हैं. लौकिक भस्म तांत्रिक मन्त्र या भगवान शिव का नाम लेके अपने शारीर पर धारण करना चाहिए. शिव पुराण में लिखा है की भगवान विष्णु, ब्रह्मा के साथ साथ सभी योगी, सिद्ध नाग आदि सभी भस्म धारण करते हैं एवं वेद का कथन है की बिना भस्म धारण किये सब प्रकार के आचार तथा पूजा निष्फल होते हैं. क्योंकि ऐसे मनुष्यों पर ना तो शिव जिसमें ही कृपा करते हैं और न ही उनका कोई कार्य ही सिद्ध होता है.

भस्म का  महात्म अनादी तथा अनंत है. भस्म कों धारण करने में कुल और वर्ण का विचार नहीं होता है. भस्म धारण करने वाले मनुष्य कों तीर्थ के सामान समझना चाहिए. भस्म धारण करने वालों कों सम्पूर्ण विद्याओं का  निधान समझना चाहिए.

जो मनुष्य भस्म धारण करने  वालों की निंदा करता है वह अपने जन्म कों निष्फल कर देता है. पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध और तरुण सभी भस्म धारण कर सकते हैं. भस्म धारण करने वाले कों अधिक पवित्रता की आवश्यकता नहीं है.
जिस ललाट पर भस्म न हो उसे धिक्कार है, जिस गाँव में शिव मंदिर न हो उसे भी धिक्कार है. सम्पूर्ण देवता मुनि येही कहते हैं की जो लोग भस्म की निंदा करते है वोह बहुत वर्षों तक नरक में निवास करते हैं. :

शरीर के अंगों पर भस्म कहाँ लगाएं:
सर, ललाट, कर्ण, नेत्र , नासिका, मुख, कंठ , भुजा, उदर, हाथ, छाती, पंजर, नाभि, मुस्क, त्रिबेली , दोनों जन्घो के मध्य का भाग, तथा चरण यह सब बत्तीस स्थान हैं लेकिन आम भक्तों के लिए सिर्फ मस्तक में नित्य त्रिपुंड लगाना ही गंगा स्नान करने के फल सामान है.

 जो भी भक्त सावन के महीने में भी कम से कम नित्य भगवान शिवजी कों भस्म अर्पण कर के स्वयं अपने माथे में त्रिपुंड (भस्म) लगाये तो उसके पास  हमेशा धन धन्य, स्वास्थ तथा ख़ुशी बानी रहती है.
सावन में एकादश रूद्र पूजा की विधि के लिए इस पृष्ठ कों पढ़ें:  रूद्र  पूजा  महातम