Tuesday, 12 April 2011

कुवारी पूजन का महत्व

हिंदू धर्म में कुवारी पूजन का महत्त्व भारत वर्ष में प्राचीन काल से चला आ रहा है। हमारे शास्त्रों में कुआरी को अग्नि, सूर्य, वायु, चंद्रमा,नक्षत्र, जल और ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। कुआरी को खिले हुए कमल के गुच्छे के सामान नवीन और कोमल कहा गया है। कुआरी के नेत्र रूपी कमल विश्व स्वरूपी जल में तैरते रहते हैं। वह मनुष्यों को प्रेम और करुना भरी दृष्टि से देखती हैं। उसकी वाणी में काफी मिठास होती। इस में कोई शंशय नही है की कुआरी को देखने के बाद मनुष्य का पुरूष भावः भी मिट जाता है।
इश्वर की आराधना कुआरी के पवित्र रूप में करने से व्यक्ति के अन्दर आध्यात्म के प्रति अच्छी विचारधारा का विकास होता है। मनुष्य के अन्दर के मनोविकार एवं दुष्ट भावो का नाश होता है और समाज की नारियों के प्रति उसके भावः में पवित्रता आती है। उसका मस्तक स्वतः कुवारियों को देख कर झुक जाता है।
शास्त्रों में नारी को पवित्रता के रूप में देखना एक अपने आप में उच्च साधना है। तथा जो भक्त देवी की उपासना करते हैं एवं कुवारियों की पूजा करते हैं उनका कभी भी पतन नही होता। कुवारी पूजन से हक्तो के अन्दर एक विशेष प्रकार की शक्ति का समावेश होता है जो जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति के मार्ग को प्रशस्त्र करता है।
तंत्रों में भी कुअरियों को साधना के रूप में अपनाया जाता है। जो भक्त नित्य कुवारियों का पूजन करता है एवं अन्न, वस्त्र दान करता है उसको संसार के सभी भौतिक सुखो की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार हिंदू धर्म में ब्रह्मण भोज का महत्त्व है उसी प्रकार कुवारी पूजन एवं भोज का महत्त्व है।
शास्त्रों में यह भी वर्णन है की जिस स्थान पर कुवारियों की पूजा होती है उस स्थान से चारो दिशाओं के पाँच कोसो तक के क्षेत्र में सुख शान्ति का वास और दरिद्रता का नाश होता है। ऋषि मनु जैसे महर्षि ने कहा है की जहा नारी की पूजा होती है वह देवता का निवास होता है।
किस कुवारी की पूजा करनी चाहिए?
१ ब्रह्मण की लड़की दस वर्ष की आयु से नीचे
२ क्षत्रिय की लड़की दस वर्ष की आयु से नीचे
३ वैश्य की लड़की दस वर्ष की आयु से नीचे
४ शुद्र की लड़की दस वर्ष की आयु से नीचे
५ प्रताडित नारी की लड़की दस वर्ष की आयु से नीचे
यह सभी कुवारी लडकियां पूजन के योग्य हैं। जिस कुवारी पूजन में किसी एक ही वर्ण की लड़किया होती हैं उसे निम्न स्तर का पूजन कहा जाता है। जिस कुवारी पूजन में दो वर्ण की लड़किया होती हैं उसे मध्य स्तर का पूजन कहा जाता है। जिस कुवारी पूजन में पांचो वर्णों की कुवारी लड़कियां हो उसे उच्चकोटि का कुवारी पूजन माना जाता है।
कैसे करें कुवारी पूजन?
नवमी के दिन हवन करने के पश्चात् कुवारियों को नए वस्त्र पहना कर विधिवत पूजा अर्चना कर उत्तम पकवानों का भोग लगा कर, दक्षिणा दान कर, आरती करें और अंत में उन कुवारियों के झूठन को प्रसाद के रूप में स्वयं ग्रहण करें। शास्त्रों में लिखा गया है की ऐसा करने से महाव्याधि (कुष्ठ ) जैसे रोगों का नाश होता है।

दसवां दिन: माँ कमला

दसवें दिन की महा देवी माँ कमला स्वरुप
हैं। इनकी साधना साधक को आकाश की ओर मुख करके करनी चाहिए।इनका महा मंत्र - क्रीं ह्रीं कमला ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ कमला का जाप दसो महाविद्या में सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। इनका जाप करने वाले जीवन में कभी भी दरिद्र नही होते। शास्त्रों में कहा गया है की जो माँ कमला की साधना करते हैं उन्हे सभी प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं।

नौवां दिन: माँ मातंगी

नौवे दिन की महा देवी माँ मातंगी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पृथ्वी की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र - क्रीं ह्रीं मातंगी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ मातंगी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके जीवन में माता के प्रेम की कमी हो अथवा उनकी माता को कोई कष्ट हो। जो किसान आकाल या बाढ़ से पीड़ित होते है वे भी माँ मातंगी का अगर सामूहिक रूप से जाप करे तो अकाल या बढ़ का प्रभाव कम होता है.

Monday, 11 April 2011

आठवां दिन: माँ बंगलामुखी


आठवे दिन की महा देवी माँ बंगलामुखी स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को भंडार कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। भंडार कोण पश्चिम और उत्तर दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र - क्रीं ह्रीं बंगलामुखी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें। माँ बंगलामुखी का जाप ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिनके ऊपर किसी तांत्रिक क्रिया को कराया जा रहा हो और जिस से वो परेशान हो। इस मंत्र का जाप करने से वैसे दुष्ट व्यक्तियों का नाश होता है। इनका जाप करते समय साधक को पीला वस्त्र धारण करना चाहिए और पीले माला से जाप करना चाहिए। उस माला को जाप ख़त्म होने के बाद किसी पीपल के पेड़ पर टांग देना चाहिए.

Sunday, 10 April 2011

सातवाँ दिन: माँ धूमावती

सातवें दिन की महा देवी माँ धूमावती स्वरुप हैं। इनकी साधना साधक को पश्चिम कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र - क्रीं ह्रीं धूमावती ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके घर से रोग, कलह, दरिद्रता का नाश होता है.

Saturday, 9 April 2011

छठा दिन: माँ भैरवी

छठे दिन की महा देवी माँ भैरवी स्वरुप हैं इनकी साधना साधक को नैरित कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए।नैरित कोण दक्षिण और पश्चिम दिशा के बीच का कोण होता है।इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं भैरवी ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा अकाल मृत्यु , दुष्टात्मा के प्रभाव से बचाव होता hai।

पांचवा दिन: माँ छिन्मस्तिका काली


पांचवा दिन की महा देवी माँ छिन्मस्तिका काली स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को दक्षिण कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं छिन्मस्तिका ह्रीं क्रीं स्वाहा: है। इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो दुष्टों का नाश होता है तथा उस व्यक्ति के तमो गुन और रजो गुन का भी नाश होता है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उनके काम वासना को नियंत्रित करता है.

Thursday, 7 April 2011

चौथा दिन- माँ षोडशी

चौथा दिन की महा देवी माँ षोडशी स्वरुप हैं।
इनकी साधना साधक को अग्नि कोन की ओर मुख करके करनी चाहिए। अग्नि कोन पूर्व दक्षिण दिशा के बीच के कोन को कहते हैं।-क्रीं ह्रीं षोडशी ह्रीं क्रीं स्वाहा: इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनका यौवन बना रहता है तथा उस व्यक्ति मैं आकर्षण की शक्ति बढती है। साथ ही साथ जो पुरूष या महिला इस मंत्र का जाप करते हैं उन्हें कार्तिक के सामान वीर पुत्र की प्राप्ति होती है।

Wednesday, 6 April 2011

तीसरा दिन: माँ भुवनेश्वरी

तीसरे दिन की महा देवी माँ भुवनेश्वरी स्वरुप हैं
इनकी साधना साधक को पूरब की ओर मुख करके करनी चाहिए।
इनका महा मंत्र क्रीं ह्रीं भुवनेश्वरी ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम १०८ -१०८ बार इस मंत्र का जाप करें तो भुवन के सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ उसे प्राप्त होती हैं तथा दरिद्र व्यक्तियों का इनकी आराधना करना सबसे उचित माना गया है.

द्वितीय दिन: माँ तारा की साधना.


दूसरे दिन की महा देवी माँ तारा स्वरुप हैं
इनकी साधना साधक को ईशान कोने की ओर मुख करके करनी चाहिए। ईशान कोन उत्तर पूर्व दिशा के बीच के कोन को कहते हैं.
इनका महा मंत्र -क्रीं ह्रीं तारा ह्रीं क्रीं स्वाहा.
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।
सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस महा मंत्र का जाप १०८-१०८ बार करें तो उनके पुत्र के कष्टों का नाश होता है. अथवा अगर पुत्रहीन स्त्रियाँ यह जाप करें तो उन्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र के जाप से दुश्मनों पर विजय की प्राप्ति भी होती है.

Tuesday, 5 April 2011

नवरात्र प्रारम्भ- प्रथम दिन माँ काली


नवरात्र में दस महा विद्या की साधना सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। उच्च्य कोटि के साधक चैत्र नवरात्र में ही दस महाविद्या की साधना को सिद्ध किया करते हैं. उन सभी भक्तो और साधुओं के लिए दस महाविद्या की साधना कैसे करें मैं यहाँ संचिप्त में वर्णन कर रहा हूँ।

प्रथम दिन की महा देवी काली स्वरुप हैं
इनकी साधना साधक को उत्तर की ओर मुख करके करनी चाहिए
इनका महा मंत्र - क्रीं ह्रीं काली ह्रीं क्रीं स्वाहा:
इस मंत्र का कम से कम ११०० बार जाप करना चाहिए तथा विशेष सिद्धि के लिए विशेष जाप की आवशकता होती है।

दस महाविद्या की साधना करनेवाले सभी साधको को ९ दिन फलहार में रहना चाहिए तथा किसी एक रंग के वस्त्र को नौ दिन धारण करना चाहिए।
रंगों में तीन रंग प्रमुख हैं- काला (उत्तम ), लाल (मध्य ), सफ़ेद (निम्न)। इस प्रकार का साधना विशेष साधको के लिए है। परन्तु सामान्य भक्तजन न्यूनतम सुबह शाम इस म़हामंत्र का जाप 108 बार करें तो उनके घरमें सुख शान्ति बनी रहती है और आकाल मृत्यु नही होती है.

मैं इस ब्लॉग में नवों दिन दस महा विद्या की देवियों की पूजा का इसी प्रकार वर्णन करूँगा। विस्तृत जानकारी के लिए संजय्तंत्रम पुस्तक को पढे। यह पुस्तक आप मेरी साईट Books To Download से खरीद सकते हैं.

Saturday, 4 December 2010

पुत्र प्राप्ति हेतु अचूक उपचार

पुत्र प्राप्ति हेतु सिद्ध किया हुआ शिवलिंगी जड़ी नित्य खाली पेट जो महिलाए दूध के साथ खाती हैं उन्हे अवश्य पुत्र प्राप्ति होती है. लेकिन यह शिवलिंगी जड़ी किसी वाम मार्गी साधक द्वारा सिद्ध किया होना चाहिए ओर इसका सेवन कम से कम एक साल तक लागातार करना पड़ता है.


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वास्तु दोष निवारण उपाय

जब भी नया घर लेते हैं ओर उसमें परेशानिया आने लगे जैसे की अनेक प्रकार के आवाज़ सुनाई देना, भय लगना, घर में मृत्यु हो जाना, संतान की मृत्यु हो जाना, व्यापार में मंदी होना, एकाएक घर में आग लग जाना, घर के लोगो का अस्वस्थ हो जाना यह सब वास्तु दोष माने जाते हैं.

इसके निवारण के लिए वास्तु दोष निवारण कलश का अविष्कार किया गया है. ओर जिन लोगों ने भी इसे अपने घर के इशान कोने में अमावस्या की रात को  स्थापित किया है उनकी यह सभी बाधाएँ डोर हुई है.

नोट: इस कलश का प्रयोग तभी करें जब आप सभी क्रियाओं से निराश हो गये हो.

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काला जादू ऑर ब्लॅक मॅजिक से ग्रस्त लोगों के लिए चमत्कारी उपाय

जिस व्यक्ति के घर में लगातार कोई व्यक्ति बीमार रहता हो ऑर डॉक्टर के दिखाने के बाद भी वो अस्वस्थ रहता हो या
कोई भी व्यापार में तरक्की नही हो पाती हो, लगातार घर में दुर्घटना होती रहती है.
किसी भी मेडिकल प्राब्लम  के ना होने के बावजूद भी संतान का जन्म नही हो पा रहा हो.
पति पत्नी के बीच लगातार मन मुटाव है या फिर पति या पत्नी किसी दूसरे के प्रभाव में आ कर एक दूसरे से अलग हो गये हो,शरीर पर सो के उठने के बाद यदि काले काले धब्बे दिखाई देते है तो यह कथित जादू टोना या नज़र लगने के प्रभाव माने जाते है.

जब भी यह सब प्रॉब्लम्स किसी डॉक्टर से इलाज़ लेने के बाद भी ठीक ना हो तब आप एक बार सर्व बाधा निवारण यंत्र को धारण कर के देखें. इस से पीड़ित व्यक्ति को काफ़ी हद तक फ़ायदा होता है.

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Saturday, 9 October 2010

अश्विन नवरात्रा २०१० प्रारंभ - ६०२ कलश की सामूहिक स्थापना.

सेवक संजयनाथ काली मंदिर में आज अश्विन नवरात्रा का प्रारंभ बड़ी ही धूम धाम से शुरू हुआ.
इस साल सामूहिक कलश स्थापना के पिछले सभी रेकॉर्ड टूट गये ऑर मंदिर के प्रांगांद में ६०२ कलशो की स्थापना हुई ऑर विधिवत नवरात्रा की पूजा की शुरुआत भी हुई.

यह अपने आप में एक विश्व रेकॉर्ड है. भारत तथा विश्व के किसी भी मंदिर में एकसाथ इतनी बड़ी सामूहिक पूजा नही होती.

भारत के अनेको राज्यो तथा ऑस्ट्रेलिया, चाइना, नेपाल, इंग्लेंड, अमेरिका,श्रीलंका तथा मारिशियस से भक्तों के कलश स्थापना के लिए नवरात्रा शुरू होने से १० दिन पहले से ही बुकिंग हो गयी थी.

Friday, 30 July 2010

सावन माह में भस्म लगाने का महात्म

सावन माह में भगवान शिव पर भस्म चढ़ाना एवं भस्म का त्रिपुंड बनाना कोटि महायज्ञ करने के सामान होता है.
साथ साथ उस भस्म कों साधक अपने मस्तक एवं अनेक अंगों पर लगते हैं तो उसके अलग अलग फल प्राप्त होते हैं.

भस्म दो प्रकार के होते हैं:

१. महा भस्म
२. स्वल्प भस्म

महा भस्म शिवजी का मुख्य स्वरुप है. पर स्वल्प भस्म की अनेक शाखाएं हैं स्त्रोत, स्मार्त और लौकिक भस्म अत्यंत प्रसिद्द स्वल्प भस्म की शाखाएं हैं.

जो भस्म वेद की रीति से धारण की जाती हैं उसे स्त्रोत भस्म कहा जाता है,
जो भस्म स्मृति अथवा पुरानो की रीति से धारण की जाती है उसे स्मार्त कहते हैं.
जो भस्म सांसारिक अग्नि से उत्पन्न होती है और धारण की जाती है उसे लौकिक कहा जाता  है.

स्त्रोत तथा स्मार्त भस्म सिर्फ आत्म ज्ञानी ब्रह्मण एवं सन्यासियों कों ही धारण करना चाहिए लेकिन लौकिक भस्म सभी वर्ण के लोग धारण कर सकते हैं. लौकिक भस्म तांत्रिक मन्त्र या भगवान शिव का नाम लेके अपने शारीर पर धारण करना चाहिए. शिव पुराण में लिखा है की भगवान विष्णु, ब्रह्मा के साथ साथ सभी योगी, सिद्ध नाग आदि सभी भस्म धारण करते हैं एवं वेद का कथन है की बिना भस्म धारण किये सब प्रकार के आचार तथा पूजा निष्फल होते हैं. क्योंकि ऐसे मनुष्यों पर ना तो शिव जिसमें ही कृपा करते हैं और न ही उनका कोई कार्य ही सिद्ध होता है.

भस्म का  महात्म अनादी तथा अनंत है. भस्म कों धारण करने में कुल और वर्ण का विचार नहीं होता है. भस्म धारण करने वाले मनुष्य कों तीर्थ के सामान समझना चाहिए. भस्म धारण करने वालों कों सम्पूर्ण विद्याओं का  निधान समझना चाहिए.

जो मनुष्य भस्म धारण करने  वालों की निंदा करता है वह अपने जन्म कों निष्फल कर देता है. पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध और तरुण सभी भस्म धारण कर सकते हैं. भस्म धारण करने वाले कों अधिक पवित्रता की आवश्यकता नहीं है.
जिस ललाट पर भस्म न हो उसे धिक्कार है, जिस गाँव में शिव मंदिर न हो उसे भी धिक्कार है. सम्पूर्ण देवता मुनि येही कहते हैं की जो लोग भस्म की निंदा करते है वोह बहुत वर्षों तक नरक में निवास करते हैं. :

शरीर के अंगों पर भस्म कहाँ लगाएं:
सर, ललाट, कर्ण, नेत्र , नासिका, मुख, कंठ , भुजा, उदर, हाथ, छाती, पंजर, नाभि, मुस्क, त्रिबेली , दोनों जन्घो के मध्य का भाग, तथा चरण यह सब बत्तीस स्थान हैं लेकिन आम भक्तों के लिए सिर्फ मस्तक में नित्य त्रिपुंड लगाना ही गंगा स्नान करने के फल सामान है.

 जो भी भक्त सावन के महीने में भी कम से कम नित्य भगवान शिवजी कों भस्म अर्पण कर के स्वयं अपने माथे में त्रिपुंड (भस्म) लगाये तो उसके पास  हमेशा धन धन्य, स्वास्थ तथा ख़ुशी बानी रहती है.
सावन में एकादश रूद्र पूजा की विधि के लिए इस पृष्ठ कों पढ़ें:  रूद्र  पूजा  महातम 

Wednesday, 14 April 2010

जगतगुरु वामचार्य सेवक संजयनाथ द्वारा महा कुम्भ हरिद्वार में शाही स्नान संपन्न

जगतगुरु वामचार्य सेवक संजयनाथ द्वारा महा कुम्भ हरिद्वार में शाही स्नान आज संपन्न. गुरुनाथ अखाडा की पेशवाई ने आज महा कुम्भ के अंतिम शाही स्नान में चार चाँद लगा दिए. भक्त जानो का उल्लास और भीड़ देखने वाली और अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना थी.













जगतगुरु वामचार्य की एक झलक पाने के लिए सभी श्रद्धालु जन अपने अपने पंडालों से बहार आ आ कर, भीड़ कों चीरते हुए उन्हें शाष्टांग दंडवत कर अपने आप कों सौभाग्यशाली बना रहे थे.

जगतगुरु वामचार्य महाराज की पेशवाई अपने आप में इतनी मनमोहक थी की गुरुनाथ अखाडा का नाम समस्त सनातन धर्म के बड़े बड़े अखाड़ो से कहीं पीछे नहीं रहा.

Friday, 9 April 2010

महा कुम्भ में गुरुनाथ अखाडा का खालसा


गुरुनाथ अखाडा के द्वारा गुरुनाथ अखाडा के सभी साधू संत एवं भक्तो के लिए महा कुम्भ के अवसर पर गौरी शंकर सेक्टर ब्लाक यू -151/152 प्लाट पर भक्तो के रहने एवं खाने पीने की व्यवस्था की गयी है।
आप सभी भक्तो कों गुरुनाथ अखाडा के जगतगुरु वामचार्य सेवक संजय नाथ महाराज द्वारा सादर आमंत्रित किया जा रहा है।

गुरुनाथ अखाडा का खालसा अभी भी हरिद्वार महा कुम्भ में वास कर रहा है। भक्तजन वहा जा सकते है। जगतगुरु वामचार्य सेवक संजयनाथ महाराज जी से महा कुम्भ हरिद्वार में भेंट ५ अप्रैल २०१० से १८ अप्रैल २०१० तक की जा सकती है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
सेवक सौरभनाथ
फ़ोन नंबर - 09931004470

Thursday, 31 December 2009

रुद्राक्ष धारण करने में कोई भेद भाव नहीं

रुद्राक्ष के बारे में अनेक लेखकों ने अनेक बातें लिखी हैं, जैसे रुद्राक्ष धारण करने के बाद यह नहीं करना चाहिए या वह नहीं करना चाहिए यह गलत धारणा है। जिस प्रकार सदा शिव सभी वर्णों के देवता है और वह किसी से भेद भाव नहीं करते उसी प्रकार रुद्राक्ष धारण करने में भी कोई रोक टोक नहीं है। सभी वर्ण के लोग, बिना कुछ त्यागे ( खान पान ) रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं, चाहे वह माँसाहारी हों या शाकाहारी।

अगले पोस्ट में रुद्राक्ष कों सिद्ध करने की विधि का इंतज़ार करे !!!

चौदह मुखी रुद्राक्ष का मनुष्यों पर अध्यात्मिक अथवा वैज्ञानिक प्रभाव


चौदह मुखी रुद्राक्ष के अध्यात्मिक प्रभाव -
चौदह मुखी रुद्राक्ष साक्षात् परम ब्रहम शिव का स्वरुप मन गया है। जितना प्रभाव एक मुखी रुद्राक्ष शरीरपर deta है उतना ही चौदह मुखी रुद्राक्ष भी देता है। जो व्यक्ति एक मुखी रुद्राक्ष या चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करता है उसे सदा शिव के सामान ही मानना चाहिए। ऐसे व्यक्ति किसी कों खुश होकर किसी कों आशीर्वाद दे या दुखी हो कर श्राप दे तो वह तुरंत फलित हो जाता है। उच्च्यकोटि के सन्यासियों , वाम मार्गियों एवं शिव तथा देवी भक्तों कों चौदह मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। जो साधक चौदह मुखी रुद्राक्ष धारण करके साधना करते है उनकी साधना अवश्य सिद्ध होती है।
चौदह मुखी रुद्राक्ष के वैज्ञानिक प्रभाव -
सभी असाध्य रोगों में इसका सेवन मधु या मक्खन के साथ लाभकारी सिद्ध होता है।